ग़ज़ल
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
यह ग़ज़ल उस निराशा और बेबसी को बयां करती है जब सभी उपाय और दवाइयाँ विफल हो जाती हैं। कवि का कहना है कि दिल की बीमारी ने सब कुछ खत्म कर दिया, और जीवन की कठिनाइयों के कारण उन्हें मजबूरन दर्द सहना पड़ा।
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1
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
सब उपाय विफल हो गए और कोई दवा काम नहीं आई, इस दिल की बीमारी ने आखिरकार अपना काम तमाम कर दिया।
2
अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँद
या'नी रात बहुत थे जागे सुब्ह हुई आराम किया
जवानी के बिस्तर में रोते हुए आँखें मूंद लीं, मानो पूरी रात जागकर बिताई हो और सुबह होने पर आराम किया।
3
हर्फ़ नहीं जाँ-बख़्शी में उस की ख़ूबी अपनी क़िस्मत की
हम से जो पहले कह भेजा सो मरने का पैग़ाम किया
जाँ-बख़्शी की कृपा में मेरी अपनी क़िस्मत की ख़ूबी नहीं है; जो हमसे पहले कह दिया गया, वह मरने का संदेश था।
4
नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करें हैं हम को अबस बदनाम किया
यह झूठा आरोप है कि हम मजबूरों पर आज़ादी का इल्जाम लगाते हैं। आप जो चाहते हैं, उसके कारण आपने हमें बदनाम किया है।
5
सारे रिंद औबाश जहाँ के तुझ से सुजूद में रहते हैं
बाँके टेढ़े तिरछे तीखे सब का तुझ को इमाम किया
सारे रिंद औबाश जहाँ के तुझ से सुजूद में रहते हैं। बाँके टेढ़े तिरछे तीखे सब का तुझ को इमाम किया। (अर्थात: दुनिया के सभी प्रकार के लोग, चाहे वे सुगंधित हों या निम्न, तुझसे ही दुआ में रहते हैं; और जो लोग टेढ़े-मेढ़े, तिरछे या तीखे स्वभाव के हैं, वे सब तुझसे ही इमाम (मार्गदर्शक) हुए हैं।)
6
सरज़द हम से बे-अदबी तो वहशत में भी कम ही हुई
कोसों उस की ओर गए पर सज्दा हर हर गाम किया
सरज़द से हम को बे-अदबी तो वहशत में भी कम ही हुई; कोसों उस की ओर गए पर सज्दा हर हर गाम किया। (अर्थात, सरज़द से अपमान सहना तो जंगल में भी कम हुआ, लेकिन मैं उसके पास मीलों तक गया, पर हर कदम पर झुक गया।)
7
किस का काबा कैसा क़िबला कौन हरम है क्या एहराम
कूचे के उस के बाशिंदों ने सब को यहीं से सलाम किया
शायर पूछ रहा है कि किसका काबा, कैसा क़िबला, कौन सा हरम और क्या एहराम है। जवाब मिला कि उस गली के निवासियों ने सबको यहीं से सलाम किया।
8
शैख़ जो है मस्जिद में नंगा रात को था मय-ख़ाने में
जुब्बा ख़िर्क़ा कुर्ता टोपी मस्ती में इनआ'म किया
वह शैख़ जो रात में मस्जिद में नंगा था, वह मय-ख़ाने में जुब्बा, ख़िर्क़ा, कुर्ता और टोपी पहने हुए मस्ती में था।
9
काश अब बुर्क़ा मुँह से उठा दे वर्ना फिर क्या हासिल है
आँख मुँदे पर उन ने गो दीदार को अपने आम किया
शायर कह रहा है कि काश बुर्का मुँह से हट जाए, नहीं तो क्या लाभ? क्योंकि उन्होंने आँखों के लिए प्रिय के दीदार को अपनी इच्छा पर आमादा किया है।
10
याँ के सपीद ओ सियह में हम को दख़्ल जो है सो इतना है
रात को रो रो सुब्ह किया या दिन को जूँ तूँ शाम किया
तुम्हारे सफेद और काले रंग के प्रेम में, मेरा प्रवेश केवल इतना है: या तो मैं रात में रो-रोकर सुबह करूँ, या दिन में गुज़ारकर शाम करूँ।
11
सुब्ह चमन में उस को कहीं तकलीफ़-ए-हवा ले आई थी
रुख़ से गुल को मोल लिया क़ामत से सर्व ग़ुलाम किया
सुबह के बगीचे में हवा ने उसे कहीं तक तकलीफ दी, उसने अपने चेहरे से फूल को मोल लिया और अपनी काया से सबको गुलाम बना लिया।
12
साअद-ए-सीमीं दोनों उस के हाथ में ला कर छोड़ दिए
भूले उस के क़ौल-ओ-क़सम पर हाए ख़याल-ए-ख़ाम किया
साअद-ए-सीमीं, जो दोनों चीज़ें मैंने तुम्हारे हाथों में लाकर छोड़ दीं, तुमने उन्हें छोड़ दिया; और तुम्हारे क़ौल-ओ-क़सम पर तुमने मेरे ख़यालों का धोखा किया।
13
काम हुए हैं सारे ज़ाएअ' हर साअ'त की समाजत से
इस्तिग़्ना की चौगुनी उन ने जूँ जूँ मैं इबराम किया
मेरे सारे प्रयास हर पल की संगति से व्यर्थ हो गए, क्योंकि जब-जब मैंने इबादत की, वे चार गुना अधिक त्याग कर गए।
14
ऐसे आहु-ए-रम-ख़ुर्दा की वहशत खोनी मुश्किल थी
सेहर किया ए'जाज़ किया जिन लोगों ने तुझ को राम किया
ऐसे आहु-ए-रम-ख़ुर्दा की वहशत खोनी मुश्किल थी, और जिन लोगों ने तुझ को राम किया, उन्होंने ऐसा सेहर और ए'जाज़ किया।
15
'मीर' के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो
क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया
मीर के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया। उनका तात्पर्य है कि अब आप मीर के धर्म या मत के बारे में क्यों पूछ रहे हैं, जबकि उन्होंने तो अपने लबादे से ढँककर एकांत में बैठकर कब का इस्लाम का तर्क कर दिया है।
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