काश अब बुर्क़ा मुँह से उठा दे वर्ना फिर क्या हासिल है आँख मुँदे पर उन ने गो दीदार को अपने आम किया

“If only the burqa would lift from the mouth, otherwise what is the gain? For the eyes, they have given the sight of the beloved to their own whim.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

शायर कह रहा है कि काश बुर्का मुँह से हट जाए, नहीं तो क्या लाभ? क्योंकि उन्होंने आँखों के लिए प्रिय के दीदार को अपनी इच्छा पर आमादा किया है।

विस्तार

यह शेर बस एक इंतज़ार की कहानी कहता है। शायर कहते हैं कि काश वो अपना बुर्का उठा दे, क्योंकि बस चेहरे को देखने की ज़िद है। लेकिन क्या करें! वो अपनी आँखों की खूबसूरती को तो मुसाफ़िरों के लिए 'आम' (उपलब्ध) कर चुकी है। मतलब, आँखें ही काफ़ी हैं, पर दिल को पूरा सुकून नहीं मिलता! यह इश्क़ की वो उलझन है जहाँ नज़रों का जादू, पूरी हकीकत से ज़्यादा असर करता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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