“The disrespect shown to me, even in the wilderness, is little; I went miles toward her, but made a bow at every step.”
सरज़द से हम को बे-अदबी तो वहशत में भी कम ही हुई; कोसों उस की ओर गए पर सज्दा हर हर गाम किया। (अर्थात, सरज़द से अपमान सहना तो जंगल में भी कम हुआ, लेकिन मैं उसके पास मीलों तक गया, पर हर कदम पर झुक गया।)
यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर के इश्क़ के दर्द को बयां करता है। शायर कहते हैं कि महबूब की बे-अदबी इतनी ज़्यादा थी कि वह जंगल की وحشت में भी कम लगेगी। दूसरी लाइन में उनका समर्पण देखिए—वह मीलों तक गए, लेकिन हर कदम पर उन्होंने नतमस्तक होना सीखा। यह सिर्फ प्यार नहीं, यह वफ़ा का वो आलम है, जो इंसान को पूरी तरह से झुकने पर मजबूर कर देता है।
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