'मीर' के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया

“Why do you now ask of Mir his religion or creed? He has drawn his cloak and has long since argued for Islam in seclusion.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

मीर के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया। उनका तात्पर्य है कि अब आप मीर के धर्म या मत के बारे में क्यों पूछ रहे हैं, जबकि उन्होंने तो अपने लबादे से ढँककर एकांत में बैठकर कब का इस्लाम का तर्क कर दिया है।

विस्तार

यह शेर गहरे निराशावाद को बयां करता है। शायर पूछ रहे हैं कि अब आप मेरे दीन-ओ-मज़हब के बारे में क्यों पूछते हैं? उनका इशारा है कि हालात पहले ही तय हो चुके हैं—एक धनुष खिंचा जा चुका है और रेगिस्तान में तर्क स्थापित हो चुका है। यह बताता है कि बाहरी दबावों ने पहले ही एक विश्वास प्रणाली को थोप दिया है, इसलिए अब सवाल करना व्यर्थ है।

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