ग़ज़ल

मेरे संग-ए-मज़ार पर फ़रहाद

मेरे संग-ए-मज़ार पर फ़रहाद

यह ग़ज़ल फ़र्हाद के माध्यम से एक भावनात्मक और गहन चिंतन प्रस्तुत करती है। इसमें जीवन के मोह और मृत्यु के भय पर सवाल उठाया गया है, जिसमें कवि कहता है कि जीवन के बिना मरण से कोई अलगाव नहीं है। यह प्रेम, अस्तित्व और नश्वरता के जटिल संबंधों पर विचार करती है।

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लिपि व अर्थ
1
मेरे संग-ए-मज़ार पर फ़रहाद रख के तेशा कहे है या उस्ताद
मेरे मक़बरा (कब्र) पर फ़रहाद, क्या रहस्य उस्ताद ने बताया है?
2
हम से बिन मर्ग क्या जुदा हो मलाल जान के साथ है दिल-ए-नाशाद
मुझसे बिछड़कर क्या गम होगा, मेरे प्रिय। मेरा दिल तो हमेशा खुश रहता है।
3
मूँद आँखें सफ़र अदम का कर बस है देखा न आलम-ए-ईजाद
आँखें बंद कर, अदम के सफर पर, बस इतना काफी है कि मैंने सृजन के संसार को देख लिया।
4
फ़िक्र-ए-ता'मीर' में न रह मुनइम ज़िंदगानी की कुछ भी है बुनियाद
मरम्मत की चिंता में मत रहो मुनइम, ज़िंदगी की कुछ तो बुनियाद है।
5
ख़ाक भी सर पे डालने को नहीं किस ख़राबे में हम हुए आबाद
मेरे सिर पर तो धूल भी नहीं है, किस बर्बादी में हम बस गए और समृद्ध हुए।
6
सुनते हो टुक सुनो कि फिर मुझ बाद न सुनोगे ये नाला ओ फ़रियाद
सुनो, यह एक अकेली विनती है, क्योंकि मेरे बाद तुम यह विलाप नहीं सुन पाओगे।
7
लगती है कुछ सुमूम सी तो नसीम ख़ाक किस दिलजले की बर्बाद
ये नसीम (हवा) कुछ फूलों की खुशबू जैसा लगता है, और यह पूछ रहा है कि किस जलते हुए दिल की राख बर्बाद हो गई है।
8
भूला जाए है ग़म-ए-बुताँ में जी ग़रज़ आता है फिर ख़ुदा ही याद
भूलने के गम में जीया जाता है, लेकिन जब ज़रूरत पड़ती है, तो केवल ख़ुदा को याद किया जाता है।
9
तेरे क़ैद-ए-क़फ़स का क्या शिकवा नाले अपने से अपने से फ़रियाद
तेरे क़ैद-ए-क़फ़स का क्या शिकवा, नाले अपने से अपने से फ़रियाद। इसका शाब्दिक अर्थ है कि पिंजरे की कैद का क्या शिकायत करना, जब नदियाँ खुद से ही शिकायत कर रही हैं।
10
हर तरफ़ हैं असीर हम-आवाज़ बाग़ है घर तिरा तो ऐ सय्याद
हर जगह हम तुम्हारी आवाज़ के क़ैदी हैं, ऐ सय्याद, और तुम्हारा बाग़ ही तुम्हारा घर है।
11
हम को मरना ये है कि कब हों कहीं अपनी क़ैद-ए-हयात से आज़ाद
क्या मृत्यु का इंतज़ार है, या कहीं समय आने पर अपनी जीवन की इस कैद से आज़ाद होना।
12
ऐसा वो शोख़ है कि उठते सुब्ह जाना सो जाए उस की है मो'ताद
ऐसा वो शोख़ है कि सुबह उठते ही, फिर सो जाता है; उसकी यही आदत है।
13
नहीं सूरत-पज़ीर नक़्श उस का यूँ ही तस्दीक़ खींचे है बहज़ाद
नहीं सूरत-पज़ीर का नक़्श है, जो यूँ ही तस्दीक़ खींच ले बहज़ाद।
14
ख़ूब है ख़ाक से बुज़ुर्गों की चाहना तो मिरे तईं इमदाद
बुज़ुर्गों की चाहत मिट्टी से बनी एक भेंट है।
15
पर मुरव्वत कहाँ की है ऐ 'मीर' तू ही मुझ दिलजले को कर इरशाद
पर मुरव्वत कहाँ की है ऐ 'मीर', तू ही मुझ दिलजले को कर इरशाद। इसका अर्थ है कि ऐ मीर, तुम्हारा वह मनमोहक आकर्षण कहाँ गया? केवल तुम ही इस जलते हुए दिल को कृपा प्रदान कर सकते हो।
16
ना-मुरादी हो जिस पे परवाना वो जलाता फिरे चराग़-ए-मुराद
जिस पर ना-मुरादी हो, वो परवाना/मोमबत्ती की तरह, मुराद के चराग़ को जलाता फिरता है।
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मेरे संग-ए-मज़ार पर फ़रहाद | Sukhan AI