ना-मुरादी हो जिस पे परवाना
वो जलाता फिरे चराग़-ए-मुराद
“The one who is not devoted to Murad, / Keeps lighting the lamp of his desire.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
जिस पर ना-मुरादी हो, वो परवाना/मोमबत्ती की तरह, मुराद के चराग़ को जलाता फिरता है।
विस्तार
यह शेर इश्क़ की उस अजीबोगरीब सच्चाई को बयान करता है, जब प्यार सिर्फ़ चाहत बनकर ज़िंदा रहता है। परवाना (दीवाना) जलता रहेगा, भले ही महबूब (मुराद) कभी कोई मेहरबानी न करे। ये वह तड़प है जो दिल में जलती रहती है... बिना किसी उम्मीद के, बस याद के सहारे!
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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