ग़ज़ल
तिरे जमाल-ए-हक़ीक़त की ताब ही न हुई
ترے جمال حقیقت کی تاب ہی نہ ہوئی
यह ग़ज़ल परम सत्य के सौंदर्य की अगम्यता और सच्चे प्रेम में आत्म-समर्पण की भावना को प्रकट करती है। इसमें कवि कहता है कि मानव दृष्टि उस दिव्य तेज को पूरी तरह सहन नहीं कर सकती, और सच्चा प्रेम वही है जहाँ महबूब की ख़ुशी के लिए ग़म को भी ख़ुशी मानकर स्वीकार किया जाए।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
तिरे जमाल-ए-हक़ीक़त की ताब ही न हुई
हज़ार बार निगह की मगर कभी न हुई
मुझमें आपके वास्तविक सौंदर्य के तेज को सहने की शक्ति कभी नहीं थी; मैंने हज़ारों बार देखने का प्रयास किया, लेकिन कभी उसे सहन न कर सका।
2
तिरी ख़ुशी से अगर ग़म में भी ख़ुशी न हुई
वो ज़िंदगी तो मोहब्बत की ज़िंदगी न हुई
अगर तुम्हारी ख़ुशी की ख़ातिर ग़म में भी ख़ुशी न मिले, तो ऐसी ज़िंदगी वास्तव में मोहब्बत की ज़िंदगी नहीं हो सकती।
3
कहाँ वो शोख़ मुलाक़ात ख़ुद से भी न हुई
बस एक बार हुई और फिर कभी न हुई
वह शोख़ मुलाक़ात दोबारा कभी नहीं हुई, यहाँ तक कि खुद अपने आप से भी न हो सकी; वह बस एक ही बार हुई थी और उसके बाद फिर कभी नहीं हुई।
4
वो हम हैं अहल-ए-मोहब्बत कि जान से दिल से
बहुत बुख़ार उठे आँख शबनमी न हुई
हम ऐसे मोहब्बत करने वाले हैं कि दिल और जान से दर्द का बहुत बुख़ार और तपन उठी, फिर भी हमारी आँखें आँसुओं से नम नहीं हुईं।
5
ठहर ठहर दिल-ए-बेताब प्यार तो कर लूँ
अब उस के ब'अद मुलाक़ात फिर हुई न हुई
ऐ बेचैन दिल, ज़रा ठहर जा और मुझे प्यार तो कर लेने दे, क्या पता इस बार के बाद दोबारा मुलाक़ात हो या न हो।
6
मिरे ख़याल से भी आह मुझ को बोद रहा
हज़ार तरह से चाहा बराबरी न हुई
अफ़सोस कि मेरे ख़याल और मेरे बीच भी एक दूरी बनी रही; मैंने हज़ारों तरह से कोशिश की, लेकिन बराबरी कभी हासिल न हो सकी।
7
हम अपनी रिंदी-ओ-ताअत पे ख़ाक नाज़ करें
क़ुबूल-ए-हज़रत-ए-सुल्ताँ हुई हुई न हुई
हमें अपनी रिंदी (मस्ती) या इबादत पर ज़रा भी घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह तो उस मालिक (ईश्वर) की मर्ज़ी है कि वह इसे स्वीकार करे या न करे।
8
कोई बढ़े न बढ़े हम तो जान देते हैं
फिर ऐसी चश्म-ए-तवज्जोह हुई हुई न हुई
कोई आगे बढ़े या न बढ़े, हम तो अपनी जान न्योछावर करते हैं; न जाने फिर कभी ऐसी कृपा-दृष्टि दोबारा नसीब होगी या नहीं।
9
तमाम हर्फ़-ओ-हिकायत तमाम दीदा-ओ-दिल
इस एहतिमाम पे भी शरह-ए-आशिक़ी न हुई
तमाम शब्दों, कहानियों और दिल-ओ-नज़र की सारी गहराइयों को झोंक देने के बावजूद, इतने बड़े इंतज़ाम के बाद भी इश्क़ की सही व्याख्या न हो सकी।
10
फ़सुर्दा-ख़ातिरी-ए-इश्क़ ऐ मआज़-अल्लाह
ख़याल-ए-यार से भी कुछ शगुफ़्तगी न हुई
ईश्वर रक्षा करे, प्रेम की मायूसी इस हद तक बढ़ गई है कि महबूब के ख़याल से भी दिल में कोई ताज़गी या ख़ुशी पैदा नहीं हुई।
11
तिरी निगाह-ए-करम को भी आज़मा देखा
अज़िय्यतों में न होनी थी कुछ कमी न हुई
मैंने तुम्हारी मेहरबानी भरी नज़र को भी आज़मा कर देख लिया, लेकिन मेरी तकलीफ़ों में कोई कमी नहीं होनी थी और न ही हुई।
12
किसी की मस्त-निगाही ने हाथ थाम लिया
शरीक-ए-हाल जहाँ मेरी बे-ख़ुदी न हुई
जहाँ मेरी अपनी बेख़ुदी भी मेरा साथ नहीं दे सकी, वहाँ किसी की नशीली निगाह ने आकर मेरा हाथ थाम लिया।
13
सबा ये उन से हमारा पयाम कह देना
गए हो जब से यहाँ सुब्ह ओ शाम ही न हुई
ऐ सुबह की हवा, उनसे हमारा यह संदेशा कह देना कि जब से तुम यहाँ से गए हो, तब से यहाँ न सुबह हुई है और न शाम।
14
वो कुछ सही न सही फिर भी ज़ाहिद-ए-नादाँ
बड़े-बड़ों से मोहब्बत में काफ़िरी न हुई
ऐ नादान ज़ाहिद! बात चाहे जो भी हो, लेकिन मोहब्बत में जो काफ़िरी (समर्पण की हद) दरकार होती है, वो बड़े-बड़ों से भी मुमकिन न हो सकी।
15
इधर से भी है सिवा कुछ उधर की मजबूरी
कि हम ने आह तो की उन से आह भी न हुई
मेरी मजबूरी के मुकाबले उनकी मजबूरी कहीं ज्यादा बड़ी है, क्योंकि मैं कम से कम आह तो भर सका लेकिन वे आह भी न भर सके।
16
ख़याल-ए-यार सलामत तुझे ख़ुदा रक्खे
तिरे बग़ैर कभी घर में रौशनी न हुई
ऐ महबूब के ख़याल, ख़ुदा तुझे सलामत रखे, क्योंकि तेरे बिना इस घर में कभी रोशनी नहीं हुई।
17
गए थे हम भी 'जिगर' जल्वा-गाह-ए-जानाँ में
वो पूछते ही रहे हम से बात भी न हुई
ऐ जिगर, हम भी महबूब की महफ़िल में गए थे, लेकिन वह दूसरों से हमारे बारे में पूछते ही रह गए और हमसे कोई बात भी न हो सकी।
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