वो कुछ सही न सही फिर भी ज़ाहिद-ए-नादाँ — जिगर मुरादाबादी
“Be that as it may, O foolish ascetic, know this: Even the greatest could not tread love's path without turning heretic.”
अर्थ
ऐ नादान ज़ाहिद! बात चाहे जो भी हो, लेकिन मोहब्बत में जो काफ़िरी (समर्पण की हद) दरकार होती है, वो बड़े-बड़ों से भी मुमकिन न हो सकी।
विस्तार
शायर यहाँ नासमझ ज़ाहिद (उपदेशक) से मुख़ातिब होकर कहता है कि भले ही मुझमें हज़ार कमियाँ हों, लेकिन इश्क़ का मक़ाम तुम्हारी समझ से कहीं ऊँचा है। सच्ची मोहब्बत में अपनी 'अना' (अहंकार) और दुनियावी कायदों को पूरी तरह मिटाना पड़ता है, जिसे रूढ़िवादी दुनिया अक्सर कुफ़्र या नास्तिकता समझ बैठती है। यह ऐसा आग का दरिया और हिम्मत का इम्तिहान है जिसे पार करने का हौसला बड़े-बड़े धर्मात्माओं और अक्लमंदों में भी नहीं होता।
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