इधर से भी है सिवा कुछ उधर की मजबूरी — जिगर मुरादाबादी

इधर से भी है सिवा कुछ उधर की मजबूरी कि हम ने आह तो की उन से आह भी न हुई

“Far greater than my own constraint is the helplessness they bear: for I at least could heave a sigh, while even a sigh to them was denied.”

— जिगर मुरादाबादी

अर्थ

मेरी मजबूरी के मुकाबले उनकी मजबूरी कहीं ज्यादा बड़ी है, क्योंकि मैं कम से कम आह तो भर सका लेकिन वे आह भी न भर सके।

विस्तार

यह शे’र महबूब की ख़ामोशी और उसकी लाचारी के दर्द को बेहद नफ़ासत से बयां करता है। आशिक़ समझता है कि वह तो ग़म में आह भरकर अपना दर्द हल्का भी कर लेता है, लेकिन महबूब पर समाज और हया की ऐसी बंदिशें हैं कि वह आह तक नहीं भर सकता। यहाँ शिकायत की जगह महबूब की बेबसी के लिए गहरी हमदर्दी और मोहब्बत का खूबसूरत एहसास नज़र आता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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