वो हम हैं अहल-ए-मोहब्बत कि जान से दिल से — जिगर मुरादाबादी

वो हम हैं अहल-ए-मोहब्बत कि जान से दिल से बहुत बुख़ार उठे आँख शबनमी न हुई

“Such lovers are we that from the depths of heart and soul, fierce vapors of sorrow arose, yet never did the eye turn dewy.”

— जिगर मुरादाबादी

अर्थ

हम ऐसे मोहब्बत करने वाले हैं कि दिल और जान से दर्द का बहुत बुख़ार और तपन उठी, फिर भी हमारी आँखें आँसुओं से नम नहीं हुईं।

विस्तार

यह शेर सच्चे आशिक़ों के उस गहरे आत्मसम्मान को दिखाता है, जो दिल की हर तकलीफ़ को अंदर ही अंदर समेट लेते हैं। यहाँ दिल और रूह से उठते 'बुख़ार' यानी दर्द की तपन का मुक़ाबला उन आँखों से है जो ज़रा भी 'शबनमी' या नम नहीं हुईं। शायर कहना चाहते हैं कि उनका दर्द इतना गहरा और पाकीज़ा है कि उसने खुद को अंदर ही सुलगाए रखा, मगर आंसुओं में ढलकर दुनिया के सामने नुमाइश नहीं बनने दिया।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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