गए थे हम भी 'जिगर' जल्वा-गाह-ए-जानाँ में — जिगर मुरादाबादी
“I too had gone, O Jigar, where the beloved's presence shone in grace; / Though they kept inquiring after me, we never spoke face to face.”
अर्थ
ऐ जिगर, हम भी महबूब की महफ़िल में गए थे, लेकिन वह दूसरों से हमारे बारे में पूछते ही रह गए और हमसे कोई बात भी न हो सकी।
विस्तार
इस शेर में महबूब की महफ़िल में पहुँचकर भी तन्हा रह जाने की बड़ी दर्दभरी और खूबसूरत दास्तान है। जिगर साहब कहते हैं कि हम भी उस नूरानी महफ़िल में मौजूद थे और महबूब लोगों से हमारे ही बारे में दरियाफ़्त करता रहा, मगर हमारी आपस में सीधी बात न हो सकी। यह नज़दीकी के बावजूद फ़ासले का वह आलम है, जहाँ महफ़िल की हिचक, अदब या महबूब का जलाल लबों को खामोश कर देता है।
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