बहादुर शाह ज़फ़र
ज़फ़र ने चार मुकम्मल दीवान संकलित किए, जिनमें सैकड़ों ग़ज़लें मौजूद हैं। 'बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी' और 'लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में' जैसी उनकी ग़ज़लें दर्द और नफ़ासत की मिसाल हैं। उनके कलाम में निजी तबाही और सूफ़ी वैराग्य की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है।
उन्होंने अपनी शायरी की इस्लाह पहले शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ और बाद में मिर्ज़ा ग़ालिब से ली। ज़फ़र का अंदाज़-ए-बयां सीधा, संगीतमय और जज़्बाती है, जो दिल्ली के क्लासिकी दबिस्तान की नज़ाकत को दर्शाता है।
मुग़ल सल्तनत के आख़िरी चराग़ के रूप में उनका साहित्यिक स्थान इतिहास और आज़ादी की दास्तान से जुड़ा है। उपमहाद्वीप के शीर्ष ग़ज़ल गायकों द्वारा गाए जाने के कारण उनकी रचनाएँ आज भी बेहद लोकप्रिय हैं।
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