ग़ज़ल

सब रंग में उस गुल की मिरे शान है मौजूद

سب رنگ میں اس گل کی مرے شان ہے موجود
बहादुर शाह ज़फ़र· Ghazal· 7 shers· radif: है मौजूद

यह ग़ज़ल ईश्वरीय महबूब की सर्वव्यापकता को उजागर करती है, जिसकी शान और सौंदर्य सृष्टि के हर रंग तथा हर पल में उपस्थित है। इसमें सूफ़ी भाव के साथ अचेत व्यक्ति को दृष्टि खोलने और संपूर्ण कायनात में ईश्वरीय उपस्थिति का अनुभव करने का आध्यात्मिक संदेश दिया गया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
सब रंग में उस गुल की मिरे शान है मौजूद ग़ाफ़िल तू ज़रा देख वो हर आन है मौजूद
हर रंग में मेरे उस फूल की शान मौजूद है। ऐ ग़ाफ़िल इंसान, तू ज़रा देख कि वह हर पल मौजूद है।
2
हर तार का दामन के मिरे कर के तबर्रुक सर-बस्ता हर इक ख़ार-ए-बयाबान है मौजूद
जंगल का हर काँटा मेरे दामन के हर एक धागे को तबर्रुक (पवित्र भेंट) मानकर, आदरपूर्वक अपने सिर पर बाँधे मौजूद है।
3
उर्यानी-ए-तन है ये ब-अज़-ख़िलअत-ए-शाही हम को ये तिरे इश्क़ में सामान है मौजूद
शरीर का यह नग्न होना बादशाही पोशाक से भी बेहतर है, और तुम्हारे प्यार में हमारे पास यही साज़-ओ-सामान मौजूद है।
4
किस तरह लगावे कोई दामाँ को तिरे हाथ होने को तू अब दस्त-ओ-गरेबान है मौजूद
कोई तुम्हारे दामन को हाथ कैसे लगा सकता है, जब तुम तो अब गिरेबान पकड़कर लड़ने के लिए बिल्कुल तैयार खड़े हो।
5
लेता ही रहा रात तिरे रुख़ की बलाएँ तू पूछ ले ये ज़ुल्फ़-ए-परेशान है मौजूद
मैं पूरी रात तुम्हारे चेहरे की बलाएँ लेता रहा; यदि विश्वास न हो तो अपनी बिखरी हुई ज़ुल्फ़ों से पूछ लो, वे गवाह के रूप में यहाँ मौजूद हैं।
6
तुम चश्म-ए-हक़ीक़त से अगर आप को देखो आईना-ए-हक़ में दिल-ए-इंसान है मौजूद
अगर आप सच्चाई की आँख से खुद को देखें, तो ईश्वर के आईने में इंसान का दिल मौजूद है।
7
कहता है 'ज़फ़र' हैं ये सुख़न आगे सभों के जो कोई यहाँ साहिब-ए-इरफ़ान है मौजूद
ज़फ़र कहते हैं कि वे यह कलाम उन सभी लोगों के सामने कह रहे हैं, जो कोई भी यहाँ आध्यात्मिक ज्ञान और समझ रखने वाला मौजूद है।
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