ग़ज़ल
या मुझे अफ़सर-ए-शाहाना बनाया होता
یا مجھے افسر شاہانہ بنایا ہوتا
इस ग़ज़ल में शायर सांसारिक बुद्धि और चेतना के कष्टों पर अफ़सोस जताते हुए अपनी नियति से शिकवा करता है। वह कामना करता है कि काश उसे या तो राजसी वैभव मिलता, या फ़क़ीरी की बेफ़िक्री, या फिर इश्क़ में दीवाना बना दिया जाता ताकि वह समझदारी की पीड़ा से मुक्त रह पाता। इसका लहज़ा अस्तित्वगत दर्द और आत्ममंथन से भरा है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
या मुझे अफ़सर-ए-शाहाना बनाया होता
या मिरा ताज गदायाना बनाया होता
2
अपना दीवाना बनाया मुझे होता तू ने
क्यूँ ख़िरद-मंद बनाया न बनाया होता
3
ख़ाकसारी के लिए गरचे बनाया था मुझे
काश ख़ाक-ए-दर-ए-जानाना बनाया होता
4
नश्शा-ए-इश्क़ का गर ज़र्फ़ दिया था मुझ को
उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता
5
दिल-ए-सद-चाक बनाया तो बला से लेकिन
ज़ुल्फ़-ए-मुश्कीं का तिरे शाना बनाया होता
6
सूफ़ियों के जो न था लायक़-ए-सोहबत तो मुझे
क़ाबिल-ए-जलसा-ए-रिंदाना बनाया होता
7
था जलाना ही अगर दूरी-ए-साक़ी से मुझे
तो चराग़-ए-दर-ए-मय-ख़ाना बनाया होता
8
शोला-ए-हुस्न चमन में न दिखाया उस ने
वर्ना बुलबुल को भी परवाना बनाया होता
9
रोज़ मामूरा-ए-दुनिया में ख़राबी है 'ज़फ़र'
ऐसी बस्ती को तो वीराना बनाया होता
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