ग़ज़ल

न दाइम ग़म है ने इशरत कभी यूँ है कभी वूँ है

نہ دائم غم ہے نے عشرت کبھی یوں ہے کبھی ووں ہے
बहादुर शाह ज़फ़र· Ghazal· 7 shers· radif: यूँ है कभी वूँ है

यह ग़ज़ल जीवन की अस्थिरता और निरंतर परिवर्तनशीलता को दर्शाती है, जहाँ न तो सुख स्थायी है और न ही दुख। कवि वहशत और मन की विचलित अवस्थाओं के माध्यम से मानव अस्तित्व के उतार-चढ़ाव को व्यक्त करता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
न दाइम ग़म है ने इशरत कभी यूँ है कभी वूँ है तबद्दुल याँ है हर साअ'त कभी यूँ है कभी वूँ है
2
गरेबाँ-चाक हूँ गाहे उड़ाता ख़ाक हूँ गाहे लिए फिरती मुझे वहशत कभी यूँ है कभी वूँ है
3
अभी हैं वो मिरे हमदम अभी हो जाएँगे दुश्मन नहीं इक वज़्अ पर सोहबत कभी यूँ है कभी वूँ है
4
जो शक्ल-ए-शीशा गिर्यां हूँ तो मिस्ल-ए-जाम ख़ंदाँ हूँ यही है याँ की कैफ़िय्यत कभी यूँ है कभी वूँ है
5
किसी वक़्त अश्क हैं जारी किसी वक़्त आह और ज़ारी ग़रज़ हाल-ए-ग़म-ए-फ़ुर्क़त कभी यूँ है कभी वूँ है
6
कोई दिन है बहार-ए-गुल फिर आख़िर है ख़िज़ाँ बिल्कुल चमन है मंज़िल-ए-इबरत कभी यूँ है कभी वूँ है
7
'ज़फ़र' इक बात पर दाइम वो होवे किस तरह क़ाइम जो अपनी फेरता निय्यत कभी यूँ है कभी वूँ है
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