ग़ज़ल

वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले

وہ سو سو اٹھکھٹوں سے گھر سے باہر دو قدم نکلے
बहादुर शाह ज़फ़र· Ghazal· 12 shers· radif: निकले

यह ग़ज़ल महबूब की दिलकश अदाओं और उसकी बेपरवाही को दर्शाती है, जिसकी एक झलक आशिक के दिल में बेचैनी पैदा कर देती है। इसमें इश्क़ के गहरे दर्द, तड़प और दिल के ख़ून बनकर बहते आंसुओं की मार्मिक अभिव्यक्ति है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले बला से उस की गर उस में किसी मुज़्तर का दम निकले
महबूब सौ तरह के नाज़-ओ-नखरों के साथ घर से बाहर सिर्फ़ दो क़दम ही निकला; उसे क्या फ़र्क़ पड़ता है अगर इस बीच किसी तड़पते हुए आशिक़ का दम निकल जाए।
2
कहाँ आँसू के क़तरे ख़ून-ए-दिल से हैं बहम निकले ये दिल में जम्अ थे मुद्दत से कुछ पैकान-ए-ग़म निकले
ये सिर्फ़ दिल के ख़ून में मिले हुए आँसू के क़तरे नहीं हैं, बल्कि ग़म के तीरों की नोकें हैं जो बहुत अरसे से दिल में जमा थीं और अब बाहर निकली हैं।
3
मिरे मज़मून-ए-सोज़-ए-दिल से ख़त सब जल गया मेरा क़लम से हर्फ़ जो निकले शरर ही यक-क़लम निकले
मेरे दिल के दर्द और जलन के बयान से मेरा पूरा ख़त जल गया, क्योंकि क़लम से जो भी लफ़्ज़ निकले वे सब के सब चिंगारियाँ बनकर निकले।
4
निकाल ऐ चारागर तू शौक़ से लेकिन सर-ए-पैकाँ उधर निकले जिगर से तीर उधर क़ालिब से दम निकले
ऐ हकीम, तू अपनी खुशी से तीर की नोक ज़रूर निकाल ले, लेकिन याद रख कि जैसे ही जिगर से तीर बाहर आएगा, वैसे ही शरीर से मेरी जान भी निकल जाएगी।
5
तसव्वुर से लब-ए-लालीं के तेरे हम अगर रो दें तो जो लख़्त-ए-जिगर आँखों से निकले इक रक़म निकले
अगर हम तुम्हारे लाल होठों के ख़याल में रो पड़ें, तो आँखों से निकलने वाला जिगर का हर टुकड़ा एक क़ीमती रत्न बनकर निकलेगा।
6
नहीं डरते अगर हों लाख ज़िंदाँ यार ज़िंदाँ से जुनून अब तो मिसाल-ए-नाला-ए-ज़ंजीर हम निकले
हे दोस्त! अगर रास्ते में लाखों कैदखाने भी हों, तो भी हम कैद से नहीं डरते। अपनी दीवानगी में अब हम बेड़ियों की चीख की तरह आज़ाद होकर निकल पड़े हैं।
7
जिगर पर दाग़ लब पर दूद-ए-दिल और अश्क दामन में तिरी महफ़िल से हम मानिंद-ए-शम्अ सुब्ह-दम निकले
जिगर पर ज़ख़्म, होंठों पर दिल की आहों का धुआँ और दामन में आँसू लिए, हम तुम्हारी महफ़िल से सुबह की बुझती हुई शम्अ की तरह निकले।
8
अगर होता ज़माना गेसु-ए-शब-रंग का तेरे मिरी शब-दीज़ सौदा का ज़ियादा-तर क़दम निकले
9
कजी जिन की तबीअत में है कब होती वो सीधी है कहो शाख़-ए-गुल-ए-तस्वीर से किस तरह ख़म निकले
10
शुमार इक शब किया हम ने जो अपने दिल के दाग़ों से तो अंजुम चर्ख़-ए-हशतुम के बहुत से उन से कम निकले
11
ख़ुदा के वास्ते ज़ाहिद उठा पर्दा न काबे का कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफ़िर-सनम निकले
12
तमन्ना है ये दिल में जब तलक है दम में दम अपने 'ज़फ़र' मुँह से हमारे नाम उस का दम-ब-दम निकले
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