ग़ज़ल
ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो
یہ قصہ وہ نہیں تم جس کو قصہ خواں سے سنو
इस ग़ज़ल में शायर अपने दर्द की सच्चाई बयान करते हुए कहता है कि उसके ग़म का फ़साना किसी क़िस्सागो के बजाय सीधे उसकी ज़ुबान से सुना जाना चाहिए। उसका दर्द इतना गहरा और आत्मीय है कि उसके वजूद की हर एक हड्डी से बाँसुरी की तरह विलाप और फ़रियाद निकलती है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो
मिरे फ़साना-ए-ग़म को मिरी ज़बाँ से सुनो
2
सुनाओ दर्द-ए-दिल अपना तो दम-ब-दम फ़रियाद
मिसाल-ए-नय मिरी हर एक उस्तुख़्वाँ से सुनो
3
करो हज़ार सितम ले के ज़िक्र क्या यक यार
शिकायत अपनी तुम इस अपने नीम-जाँ से सुनो
4
ख़ुदा के वास्ते ऐ हमदमो न बोलो तुम
पयाम लाया है क्या नामा-बर वहाँ से सुनो
5
तुम्हारे इश्क़ ने रुस्वा किया जहाँ में हमें
हमारा ज़िक्र न तुम क्यूँकि इक जहाँ से सुनो
6
सुनो तुम अपनी जो तेग़-ए-निगाह के औसाफ़
जो तुम को सुनना हो उस शोख़-ए-दिल-सिताँ से सुनो
7
'ज़फ़र' वो बोसा तो क्या देगा पर कोई दुश्नाम
जो तुम को सुनना हो उस शोख़-ए-दिल-सिताँ से सुनो
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