ग़ज़ल
न उस का भेद यारी से न अय्यारी से हाथ आया
نہ اس کا بھید یاری سے نہ عیاری سے ہاتھ آیا
इस ग़ज़ल में यह भाव व्यक्त किया गया है कि परम सत्य या प्रियतम का रहस्य छल-कपट या सतही मित्रता से नहीं, बल्कि हृदय की सजगता और आंतरिक बोध से ही मिलता है। शायर के अनुसार जीवन की वास्तविक मंज़िल केवल वही पा सकते हैं जो निरंतर होश और सतर्कता बनाए रखते हैं।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
न उस का भेद यारी से न अय्यारी से हाथ आया
ख़ुदा आगाह है दिल की ख़बरदारी से हाथ आया
उसका रहस्य न तो दोस्ती से पता चला और न ही चालाकी से हासिल हुआ; ईश्वर गवाह है कि वह केवल दिल की सतर्कता और सजगता से प्राप्त हुआ।
2
न हों जिन के ठिकाने होश वो मंज़िल को क्या पहुँचे
कि रस्ता हाथ आया जिस की हुश्यारी से हाथ आया
जिनके होश ठिकाने न हों, वे अपनी मंज़िल तक कभी नहीं पहुँच सकते, क्योंकि जिसे भी सही रास्ता मिला है, वह उसकी समझदारी और सतर्कता से ही मिला है।
3
हुआ हक़ में हमारे क्यूँ सितमगर आसमाँ इतना
कोई पूछे कि ज़ालिम क्या सितमगारी से हाथ आया
आसमान (किस्मत) हमारे लिए इतना ज़ालिम क्यों हो गया? कोई उस ज़ालिम से पूछे कि आख़िर इस ज़ुल्म और सितम से उसे क्या हासिल हुआ।
4
अगरचे माल-ए-दुनिया हाथ भी आया हरीसों के
तो देखा हम ने किस किस ज़िल्लत-ओ-ख़्वारी से हाथ आया
भले ही लालची लोगों के हाथ दुनिया की दौलत आ भी गई, लेकिन हमने देखा कि वह उन्हें बेहद ज़िल्लत और रुसवाई सहने के बाद ही हासिल हुई।
5
न कर ज़ालिम दिल-आज़ारी जो ये दिल मंज़ूर है लेना
किसी का दिल जो हाथ आया तो दिलदारी से हाथ आया
हे ज़ालिम, अगर तुझे यह दिल जीतना मंज़ूर है तो इसे दुख मत पहुँचा। किसी का भी दिल अगर कभी हासिल हुआ है, तो वह केवल प्यार और दिलदारी से ही मिला है।
6
अगरचे ख़ाकसारी कीमिया का सहल नुस्ख़ा है
व-लेकिन हाथ आया जिस के दुश्वारी से हाथ आया
यद्यपि विनम्रता (ख़ाकसारी) कीमिया का एक आसान नुस्ख़ा है, लेकिन यह जिसके भी हाथ आई, बहुत कठिनाई से ही हाथ आई।
7
हुई हरगिज़ न तेरे चश्म के बीमार को सेह्हत
न जब तक ज़हर तेरे ख़त्त-ए-ज़ंगारी से हाथ आया
तुम्हारी आँखों का बीमार तब तक कभी ठीक नहीं हुआ, जब तक कि उसे तुम्हारे रुख़सार के हरे ख़त से ज़हर हासिल नहीं हो गया।
8
कोई ये वहशी-ए-रम-दीदा तेरे हाथ आया था
पर ऐ सय्याद-वश दिल की गिरफ़्तारी से हाथ आया
क्या कभी ऐसा कोई बिदकने वाला जंगली जीव तुम्हारे हाथ लगा था? लेकिन ऐ शिकारी की तरह के महबूब, वह सिर्फ़ अपने दिल के क़ैद हो जाने की वजह से तुम्हारे हाथ आया।
9
'ज़फ़र' जो दो जहाँ में गौहर-ए-मक़्सूद था अपना
जनाब-ए-फ़ख़्र-ए-दीं की वो मदद-गारी से हाथ आया
ऐ ज़फ़र, दोनों जहानों में जो मेरा मक़सद रूपी अनमोल मोती था, वह हज़रत फ़ख़रुद्दीन की मदद और इनायत से मुझे हासिल हुआ।
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