ग़ज़ल

टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच

ٹکڑے نہیں ہیں آنسوؤں میں دل کے چار پانچ
बहादुर शाह ज़फ़र· Ghazal· 17 shers· radif: के चार पाँच

यह ग़ज़ल प्रेम की पीड़ा, विरह और आत्म-समर्पण की पराकाष्ठा को दर्शाती है। शायर ने अपने आँसुओं और ज़ख़्मों के मार्मिक चित्रण के माध्यम से दिल के गहरे दर्द को व्यक्त किया है, जहाँ आशिक़ अपने महबूब के ज़ुल्म और खंजर को भी सहर्ष स्वीकार करने को तैयार रहता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच सुरख़ाब बैठे पानी में हैं मिल के चार पाँच
ये आँसुओं में दिल के चार-पाँच टुकड़े नहीं हैं, बल्कि ऐसा लगता है जैसे पानी में चार-पाँच सुरख़ाब मिलकर बैठे हुए हैं।
2
मुँह खोले हैं ये ज़ख़्म जो बिस्मिल के चार पाँच फिर लेंगे बोसे ख़ंजर-ए-क़ातिल के चार पाँच
घायल के शरीर पर जो चार-पाँच खुले हुए ज़ख़्म हैं, वे ऐसा लगता है जैसे क़ातिल के ख़ंजर को चार-पाँच बार फिर चूमने के लिए मुँह खोले हुए हैं।
3
कहने हैं मतलब उन से हमें दिल के चार पाँच क्या कहिए एक मुँह हैं वहाँ मिल के चार पाँच
हमें उनसे अपने दिल की चार-पाँच बातें कहनी हैं, लेकिन हम क्या कहें जब वहाँ चार-पाँच लोग मिलकर एक आवाज़ हो रहे हैं।
4
दरिया में गिर पड़ा जो मिरा अश्क एक गर्म बुत-ख़ाने लब पे हो गए साहिल के चार पाँच
जब मेरा एक गर्म आँसू नदी में जा गिरा, तो किनारे पर चार-पाँच बुतख़ाने (मंदिर) बन गए।
5
दो-चार लाशे अब भी पड़े तेरे दर पे हैं और आगे दब चुके हैं तले गिल के चार पाँच
तुम्हारे दरवाज़े पर अब भी दो-चार लाशें पड़ी हुई हैं, और उससे आगे चार-पाँच लाशें पहले ही मिट्टी के नीचे दफ़न हो चुकी हैं।
6
राहें हैं दो मजाज़ ओ हक़ीक़त है जिन का नाम रस्ते नहीं हैं इश्क़ की मंज़िल के चार पाँच
इश्क़ की मंज़िल के सिर्फ़ दो ही रास्ते हैं जिन्हें मजाज़ (लौकिक) और हक़ीक़त (अलौकिक/ईश्वरीय) कहा जाता है, इसके चार-पाँच रास्ते नहीं हैं।
7
रंज ओ ताब मुसीबत ओ ग़म यास ओ दर्द ओ दाग़ आह ओ फ़ुग़ाँ रफ़ीक़ हैं ये दिल के चार पाँच
दुःख, तकलीफ़, मुसीबत, ग़म, निराशा, दर्द, ज़ख़्म, आह और फ़रियाद—यही सब दिल के चार-पाँच साथी हैं।
8
दो तीन झटके दूँ जूँ ही वहशत के ज़ोर में ज़िंदाँ में टुकड़े होवें सलासिल के चार पाँच
दीवानगी के ज़ोर में जैसे ही मैं दो-तीन झटके देता हूँ, क़ैदख़ाने में ज़ंजीरों के चार-पाँच टुकड़े हो जाते हैं।
9
फ़रहाद ओ क़ैस ओ वामिक़ ओ अज़रा थे चार दोस्त अब हम भी आ मिले तो हुए मिल के चार पाँच
फ़रहाद, क़ैस, वामिक़ और अज़रा चार दोस्त हुआ करते थे। अब मैं भी उनके साथ आ मिला हूँ, तो हम सब मिलकर चार-पाँच हो गए हैं।
10
नाज़ ओ अदा ओ ग़म्ज़ा निगह पंजा-ए-मिज़ा मारें हैं एक दिल को ये पिल पिल के चार पाँच
नाज़, अदा, तिरछी नज़र, निगाह और पलकों का पंजा—ये चार-पाँचों मिलकर एक अकेले दिल पर टूट पड़ते हैं और उसे बार-बार घायल करते हैं।
11
ईमा है ये कि देवेंगे नौ दिन के बाद दिल लिख भेजे ख़त में शे'र जो बे-दिल के चार पाँच
यह इस बात का इशारा है कि वे नौ दिनों के बाद अपना दिल देंगे, क्योंकि उन्होंने ख़त में बेदिल के चार-पाँच शेर लिखकर भेजे हैं।
12
हीरे के नौ-रतन नहीं तेरे हुए हैं जमा ये चाँदनी के फूल मगर खिल के चार पाँच
तुम्हारे पास हीरे के नौ रत्न जमा नहीं हुए हैं, बल्कि चाँदनी के ये चार-पाँच फूल ही खिले हैं।
13
मीना-ए-नुह-फ़लक है कहाँ बादा-ए-नशात शीशे हैं ये तो ज़हर-ए-हलाहल के चार पाँच
नौ आसमानों की इस सुराही में ख़ुशी की शराब कहाँ है? ये तो बस जानलेवा ज़हर से भरे चार-पाँच शीशे (बोतलें) हैं।
14
नाख़ुन करें हैं ज़ख़्मों को दो दो मिला के एक थे आठ दस सो हो गए अब छिल के चार पाँच
नाख़ून खुरच कर दो-दो ज़ख़्मों को मिलाकर एक कर रहे हैं; पहले जो आठ-दस ज़ख़्म थे, अब छिलकर आपस में मिलकर चार-पाँच बड़े ज़ख़्म रह गए हैं।
15
गर अंजुम-ए-फ़लक से भी तादाद कीजिए निकलें ज़ियादा दाग़ मिरे दिल के चार पाँच
अगर आसमान के तारों से भी गिनती की जाए, तो मेरे दिल के दाग़ उनसे भी चार-पाँच ज़्यादा ही निकलेंगे।
16
मारें जो सर पे सिल को उठा कर क़लक़ से हम दस पाँच टुकड़े सर के हों और सिल के चार पाँच
अगर हम अत्यधिक रंज और दुख के कारण भारी पत्थर को उठाकर अपने सिर पर दे मारें, तो हमारे सिर के दस-पाँच टुकड़े हो जाएँगे और उस पत्थर के भी चार-पाँच टुकड़े हो जाएँगे।
17
मान ऐ 'ज़फ़र' तू पंज-तन ओ चार-यार को हैं सदर-ए-दीन की यही महफ़िल के चार पाँच
ऐ ज़फ़र, तुम पंजतन और चार यार दोनों का आदर करो और उन्हें मानो, क्योंकि धर्म की महफ़िल के मुख्य अगुआ यही चार-पाँच हैं।
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