ग़ज़ल
देखो इंसाँ ख़ाक का पुतला बना क्या चीज़ है
دیکھو انساں خاک کا پتلا بنا کیا چیز ہے
यह ग़ज़ल मानव अस्तित्व के रहस्य और महबूब के अनुपम सौंदर्य पर आश्चर्य व्यक्त करती है। इसमें मिट्टी के पुतले में छुपी रूहानी ताक़त पर गौर करते हुए माशूक़ की कातिल निगाहों और ज़ुल्फ़ों के तिलिस्म को बयां किया गया है।
Source: rekhta · HI
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1
देखो इंसाँ ख़ाक का पुतला बना क्या चीज़ है
बोलता है इस में क्या वो बोलता क्या चीज़ है
देखो कि मिट्टी का बना यह इंसान क्या अनोखी चीज़ बन गया है; इसके अंदर आख़िर वह क्या है जो बोलता है और वह बोलने वाला कौन है?
2
रू-ब-रू उस ज़ुल्फ़ के दाम-ए-बला क्या चीज़ है
उस निगह के सामने तीर-ए-क़ज़ा क्या चीज़ है
महबूब की ज़ुल्फ़ों के जाल के सामने मुसीबत का फंदा कुछ भी नहीं है, और उसकी कातिल निगाह के आगे मौत का तीर कोई हैसियत नहीं रखता।
3
यूँ तो हैं सारे बुताँ ग़ारत-गर-ए-ईमाँ-ओ-दीं
एक वो काफ़िर सनम नाम-ए-ख़ुदा क्या चीज़ है
वैसे तो सभी महबूब ईमान और धर्म को लूटने वाले होते हैं, लेकिन ख़ुदा की क़सम, वह एक काफ़िर महबूब क्या ही कमाल की चीज़ है।
4
जिस ने दिल मेरा दिया दाम-ए-मोहब्बत में फँसा
वो नहीं मालूम मुज को नासेहा क्या चीज़ है
हे नसीहत देने वाले, मुझे नहीं पता कि वह क्या चीज़ है जिसने मेरे दिल को प्यार के जाल में फँसा दिया है।
5
होवे इक क़तरा जो ज़हराब-ए-मोहब्बत का नसीब
ख़िज़्र फिर तो चश्मा-ए-आब-ए-बक़ा क्या चीज़ है
अगर किसी को प्रेम के ज़हर की एक बूँद भी नसीब हो जाए, तो ऐ ख़िज़्र, फिर अमर जीवन देने वाले आब-ए-बक़ा के सोते की क्या हैसियत रह जाती है।
6
मर्ग ही सेहत है उस की मर्ग ही उस का इलाज
इश्क़ का बीमार क्या जाने दवा क्या चीज़ है
मौत ही उसकी सेहत है और मौत ही उसका इलाज है; इश्क़ का बीमार क्या जाने कि दवा किस चीज़ को कहते हैं।
7
दिल मिरा बैठा है ले कर फिर मुझी से वो निगार
पूछता है हाथ में मेरे बता क्या चीज़ है
वह महबूब मेरा दिल लेकर बैठा हुआ है और फिर मुझी से पूछता है कि बताओ मेरे हाथ में क्या चीज़ है।
8
ख़ाक से पैदा हुए हैं देख रंगा-रंग गुल
है तो ये नाचीज़ लेकिन इस में क्या क्या चीज़ है
देखो कि इस धूल और मिट्टी से कैसे रंग-बिरंगे फूल पैदा होते हैं; वैसे तो मिट्टी बिल्कुल तुच्छ और नाचीज़ लगती है, मगर इसके भीतर कैसी अद्भुत चीज़ें छिपी हैं।
9
जिस की तुझ को जुस्तुजू है वो तुझी में है 'ज़फ़र'
ढूँडता फिर फिर के तो फिर जा-ब-जा क्या चीज़ है
ऐ ज़फ़र, जिसे तू तलाश कर रहा है वह तेरे अपने अंदर ही मौजूद है; फिर तू जगह-जगह भटक कर क्या ढूँढ रहा है?
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