ग़ज़ल

क़ारूँ उठा के सर पे सुना गंज ले चला

قاروں اٹھا کے سر پہ سنا گنج لے چلا
बहादुर शाह ज़फ़र· Ghazal· 6 shers· radif: ले चला

यह ग़ज़ल दुनिया की नश्वरता और सांसारिक धन-दौलत की व्यर्थता पर विचार करती है, जहाँ क़ारूँ जैसे धनवान का हवाला देकर कंजूसों के हाथ केवल दुःख आने की बात कही गई है। कवि भौतिक लालच के खोखलेपन को रेखांकित करते हुए प्रेम, विरह और आध्यात्मिक समर्पण की महत्ता को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
क़ारूँ उठा के सर पे सुना गंज ले चला दुनिया से क्या बख़ील ब-जुज़ रंज ले चला
2
मिन्नत थी बोसा-ए-लब-ए-शीरीं कि दिल मिरा मुझ को सू-ए-मज़ार-ए-शकर गंज ले चला
3
साक़ी सँभालता है तो जल्दी मुझे संभाल वर्ना उड़ा के पाँ नशा-ए-बंज ले चला
4
दौड़ा के हाथ छाती पे हम उन की यूँ फिरे जैसे कोई चोर आ के हो नारंज ले चला
5
चौसर का लुत्फ़ ये है कि जिस वक़्त पो पड़े हम बर-चहार बोले तो बर-पंज ले चला
6
जिस दम 'ज़फ़र' ने पढ़ के ग़ज़ल हाथ से रखी आँखों पे रख हर एक सुख़न-संज ले चला
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