ग़ज़ल
शमशीर-ए-बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी ही
شمشیر برہنہ مانگ غضب بالوں کی مہک پھر ویسی ہی
इस ग़ज़ल में शायर ने महबूब के हुस्न-ओ-जमाल, उसके बालों की मनमोहक खुशबू और कातिलाना अदाओं का दिलकश चित्रण किया है। सरापा-निगारी के पारंपरिक अंदाज़ में रची गई यह रचना माशूक़ के आकर्षण और उससे उपजे सम्मोहन को खूबसूरती से उजागर करती है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
शमशीर-ए-बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी ही
जूड़े की गुंधावट क़हर-ए-ख़ुदा बालों की महक फिर वैसी ही
खुली तलवार जैसी बालों की माँग ग़ज़ब ढा रही है और बालों की महक अब भी वैसी ही है; जूड़े की बुनावट क़हर जैसी जानलेवा है, फिर भी बालों की खुशबू वैसी की वैसी है।
2
आँखें हैं कटोरा सी वो सितम गर्दन है सुराही-दार ग़ज़ब
और उसी में शराब-ए-सुर्ख़ी-ए-पाँ रखती है झलक फिर वैसी ही
महबूब की आँखें कटोरे जैसी क़यामत ढाने वाली हैं और गर्दन सुराही की तरह बेहद खूबसूरत है, जिसमें पान की सुर्खी शराब की तरह साफ़ झलकती है।
3
हर बात में उस की गर्मी है हर नाज़ में उस के शोख़ी है
क़ामत है क़यामत चाल परी चलने में फड़क फिर वैसी ही
उसकी हर बात में गरमाहट और हर नाज़-ओ-अंदाज़ में शोख़ी है। उसका क़द क़यामत की तरह लुभावना और चाल परी जैसी है, और उसके चलने में आज भी वही चंचलता और फड़क मौजूद है।
4
गर रंग भबूका आतिश है और बीनी शोला-ए-सरकश है
तो बिजली सी कौंदे है परी आरिज़ की चमक फिर वैसी ही
यदि प्रेमिका का रंग दहकती आग जैसा लाल है और उसकी नाक एक शोले की तरह तीखी है, तो यह परी बिजली की तरह कौंधती है और उसके गालों की चमक भी वैसी ही बनी रहती है।
5
नौ-ख़ेज़ कुचें दो ग़ुंचा हैं है नर्म शिकम इक ख़िर्मन-ए-गुल
बारीक कमर जो शाख़-ए-गुल रखती है लचक फिर वैसी ही
उसका नया उभार दो कलियों जैसा है और उसका कोमल पेट फूलों के ढेर के समान है; उसकी पतली कमर फूलों की डाली की तरह वैसी ही लचक रखती है।
6
है नाफ़ कोई गिर्दाब-ए-बला और गोल सुरीं रानें हैं सफ़ा
है साक़ बिलोरीं शम-ए-ज़िया पाँव की कफ़क फिर वैसी ही
प्रेमिका की नाभि आफ़त का भँवर है, नितंब गोल हैं और जांघें साफ़ व चिकनी हैं; बिल्लौरी पिंडलियाँ रोशन शमा की तरह हैं और पैरों के तलवे भी उतने ही खूबसूरत हैं।
7
महरम है हबाब-ए-आब-ए-रवाँ सूरज की किरन है उस पे लिपट
जाली की कुर्ती है वो बला गोटे की धनक फिर वैसी ही
अंदर की चोली बहते पानी के बुलबुले जैसी है जिस पर सूरज की किरण लिपटी हो, और उसके ऊपर जालीदार कुर्ती क़यामत ढाने वाली है जिस पर गोटे का काम इंद्रधनुष की तरह चमक रहा है।
8
वो गाए तो आफ़त लाए है हर ताल में लेवे जान निकाल
नाच उस का उठाए सौ फ़ित्ने घुँगरू की झनक फिर वैसी ही
जब वह गाती है तो आफ़त लाती है और हर ताल पर जान निकाल लेती है। उसका नाचना सैकड़ों उपद्रव खड़े करता है और उसके घुंघरुओं की झंकार भी वैसी ही असरदार और जानलेवा है।
9
हर बात पे हम से वो जो 'ज़फ़र' करता है लगावट मुद्दत से
और उस की चाहत रखते हैं हम आज तलक फिर वैसी ही
ऐ ज़फ़र, वह जो एक लंबे अरसे से हर बात पर हमसे लगाव दिखाता आया है, हम आज तक भी उससे पहले जैसी ही मोहब्बत रखते हैं।
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