ग़ज़ल
भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ
بھری ہے دل میں جو حسرت کہوں تو کس سے کہوں
यह ग़ज़ल दिल में दबी अनकही हसरतों, अकेलेपन और बेबसी की गहरी व्यथा को दर्शाती है। महबूब के दिल में कुदूरत होने और किसी सच्चे हमदर्द के न मिलने के कारण शायर अपने दुख-दर्द को साझा करने में असमर्थ महसूस करता है।
Source: rekhta · HI
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1
भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ
सुने है कौन मुसीबत कहूँ तो किस से कहूँ
मेरे दिल में जो हसरत भरी हुई है, वह मैं किससे कहूँ? यहाँ किसी की मुसीबत कौन सुनता है, इसलिए मैं अपना दुख किसे सुनाऊँ?
2
जो तू हो साफ़ तो कुछ मैं भी साफ़ तुझ से कहूँ
तिरे है दिल में कुदूरत कहूँ तो किस से कहूँ
अगर तुम्हारा दिल साफ़ होता तो मैं भी तुमसे साफ़-साफ़ बात करता, लेकिन जब तुम्हारे दिल में ही मैल और रंजिश है, तो फिर मैं अपनी बात किससे कहूँ?
3
न कोहकन है न मजनूँ कि थे मिरे हमदर्द
मैं अपना दर्द-ए-मोहब्बत कहूँ तो किस से कहूँ
अब न तो कोहकन (फ़रहाद) है और न मजनूँ जो मेरे हमदर्द थे, ऐसे में अब मैं अपने प्यार का दर्द आख़िर किससे कहूँ?
4
दिल उस को आप दिया आप ही पशेमाँ हूँ
कि सच है अपनी नदामत कहूँ तो किस से कहूँ
मैंने अपना दिल खुद ही उसे दिया था और अब मुझे खुद ही पछतावा हो रहा है; सच तो यह है कि जब यह गलती पूरी तरह मेरी अपनी है तो मैं अपनी शर्मिंदगी किससे कहूँ?
5
कहूँ मैं जिस से उसे होवे सुनते ही वहशत
फिर अपना क़िस्सा-ए-वहशत कहूँ तो किस से कहूँ
मैं जिससे भी अपना हाल कहता हूँ, वह सुनते ही घबराहट और दहशत का शिकार हो जाता है; ऐसे में मैं अपने पागलपन और डर की दास्तान आख़िर किसे सुनाऊँ?
6
रहा है तू ही तो ग़म-ख़्वार ऐ दिल-ए-ग़म-गीं
तिरे सिवा ग़म-ए-फ़ुर्क़त कहूँ तो किस से कहूँ
ऐ उदास दिल, तू ही हमेशा मेरा हमदर्द रहा है; तेरे अलावा मैं जुदाई का दर्द आख़िर किससे कहूँ?
7
जो दोस्त हो तो कहूँ तुझ से दोस्ती की बात
तुझे तो मुझ से अदावत कहूँ तो किस से कहूँ
अगर तुम दोस्त होते तो मैं तुमसे दोस्ती की बात करता, लेकिन तुम्हें तो मुझसे दुश्मनी है; ऐसे में मैं अपनी बात किससे कहूँ?
8
न मुझ को कहने की ताक़त कहूँ तो क्या अहवाल
न उस को सुनने की फ़ुर्सत कहूँ तो किस से कहूँ
मुझमें अपना हाल बयां करने की ताक़त नहीं है, और अगर कहूँ भी तो क्या कहूँ; उधर महबूब के पास सुनने की फ़ुरसत नहीं है, तो आख़िर मैं अपना दर्द किसे सुनाऊँ।
9
किसी को देखता इतना नहीं हक़ीक़त में
'ज़फ़र' मैं अपनी हक़ीक़त कहूँ तो किस से कहूँ
सच तो यह है कि मुझे कोई ऐसा नहीं दिखता जो मुझे गहराई से समझ सके; ऐ ज़फ़र, फिर मैं अपने दिल की हक़ीक़त किससे कहूँ?
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