ग़ज़ल

मर गए ऐ वाह उन की नाज़-बरदारी में हम

مر گئے اے واہ ان کی ناز برداری میں ہم
बहादुर शाह ज़फ़र· Ghazal· 9 shers· radif: में हम

यह ग़ज़ल इश्क़ में महबूब के नाज़-नख़रे उठाने की लाचारी और दिल की बेबसी को मार्मिक ढंग से बयां करती है। महफ़िल में शमा की तरह तिल-तिल कर जलता आशिक़ अपने आत्म-समर्पण और प्रेम के असहनीय दर्द को उजागर करता है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
अभी गीत नहीं
लिपि व अर्थ
1
मर गए ऐ वाह उन की नाज़-बरदारी में हम दिल के हाथों से पड़े कैसी गिरफ़्तारी में हम
2
सब पे रौशन है हमारी सोज़िश-ए-दिल बज़्म में शम्अ साँ जलते हैं अपनी गर्म-बाज़ारी में हम
3
याद में है तेरे दम की आमद-ओ-शुद पुर-ख़याल बे-ख़बर सब से हैं इस दम की ख़बरदारी में हम
4
जब हँसाया गर्दिश-ए-गर्दूं ने हम को शक्ल-ए-गुल मिस्ल-ए-शबनम हैं हमेशा गिर्या ओ ज़ारी में हम
5
चश्म ओ दिल बीना है अपने रोज़ ओ शब ऐ मर्दुमाँ गरचे सोते हैं ब-ज़ाहिर पर हैं बेदारी में हम
6
दोश पर रख़्त-ए-सफ़र बाँधे है क्या ग़ुंचा सबा देखते हैं सब को याँ जैसे कि तय्यारी में हम
7
कब तलक बे-दीद से या रब रखें चश्म-ए-वफ़ा लग रहे हैं आज कल तो दिल की ग़म-ख़्वारी में हम
8
देख कर आईना क्या कहता है यारो अब वो शोख़ माह से सद चंद बेहतर हैं अदा-दारी में हम
9
ऐ 'ज़फ़र' लिख तू ग़ज़ल बहर ओ क़वाफ़ी फेर कर ख़ामा-ए-दुर-रेज़ से हैं अब गुहर-बारी में हम
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.

मर गए ऐ वाह उन की नाज़-बरदारी में हम | Sukhan AI