ग़ज़ल

लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में

لگتا نہیں ہے دل مرا اجڑے دیار میں
बहादुर शाह ज़फ़र· Ghazal· 5 shers· radif: में

यह प्रसिद्ध ग़ज़ल संसार की नश्वरता, गहरी उदासी और उजड़े हुए वतन में बेबसी के दर्द को बयां करती है। शायर अपने ज़ख़्मी और टूटे हुए दिल की लाचारी प्रकट करते हुए कहते हैं कि अब इसमें अधूरी हसरतों के लिए कोई जगह नहीं बची है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में किस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में
2
इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसें इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में
3
काँटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बाँ ये भी गुलों के साथ पले हैं बहार में
4
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला क़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में
5
कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
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लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में | Sukhan AI