ग़ज़ल
उन्हें निगाह है अपने जमाल ही की तरफ़
انہیں نگاہ ہے اپنے جمال ہی کی طرف
इस ग़ज़ल में महबूब की बेरुखी और अपने ही हुस्न में मग्न रहने के अंदाज़ को दर्शाया गया है। इसके साथ ही, शायर समाज के उस नुक्ताचीन रवैये पर भी तंज़ करता है जो कला की सुंदरता को अनदेखा कर केवल कमियों पर नज़र रखता है।
Source: rekhta · HI
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1
उन्हें निगाह है अपने जमाल ही की तरफ़
नज़र उठा के नहीं देखते किसी की तरफ़
उनका ध्यान सिर्फ़ अपने ही हुस्न और सुंदरता पर लगा रहता है, वे कभी नज़र उठाकर किसी और की तरफ़ नहीं देखते हैं।
2
तवज्जोह अपनी हो क्या फ़न्न-ए-शाइरी की तरफ़
नज़र हर एक की जाती है ऐब ही की तरफ़
मैं शायरी के हुनर पर अपना ध्यान क्यों लगाऊँ, जब हर किसी की नज़र सिर्फ़ कमियों और ऐबों की तरफ़ ही जाती है?
3
लिखा हुआ है जो रोना मिरे मुक़द्दर में
ख़याल तक नहीं जाता कभी हँसी की तरफ़
चूँकि मेरी क़िस्मत में रोना ही लिखा हुआ है, इसलिए मेरा ध्यान कभी हँसी की तरफ़ जाता ही नहीं।
4
तुम्हारा साया भी जो लोग देख लेते हैं
वो आँख उठा के नहीं देखते परी की तरफ़
जो लोग तुम्हारी परछाईं भी देख लेते हैं, वे फिर किसी परी की तरफ़ आँख उठाकर भी नहीं देखते हैं।
5
बला में फँसता है दिल मुफ़्त जान जाती है
ख़ुदा किसी को न ले जाए उस गली की तरफ़
दिल मुसीबत में फँस जाता है और बेकार में जान चली जाती है, ईश्वर किसी को भी उस गली की तरफ़ न ले जाए।
6
कभी जो होती है तकरार ग़ैर से हम से
तो दिल से होते हो दर-पर्दा तुम उसी की तरफ़
जब कभी हमारे और ग़ैर के बीच कोई झगड़ा या बहस होती है, तब तुम दिल ही दिल में पर्दे के पीछे से उसी का पक्ष लेते हो।
7
निगाह पड़ती है उन पर तमाम महफ़िल की
वो आँख उठा के नहीं देखते किसी की तरफ़
पूरी महफ़िल की नज़रें उन पर टिकी हैं, मगर वे आँख उठाकर भी किसी की तरफ़ नहीं देखते।
8
निगाह उस बुत-ए-ख़ुद-बीं की है मिरे दिल पर
न आइने की तरफ़ है न आरसी की तरफ़
उस खुद को निहारने वाले महबूब की नज़र सिर्फ़ मेरे दिल पर टिकी है; वह न तो बड़े आईने की तरफ़ देख रहा है और न ही अंगूठी के शीशे की तरफ़।
9
क़ुबूल कीजिए लिल्लाह तोहफ़ा-ए-दिल को
नज़र न कीजिए इस की शिकस्तगी की तरफ़
ख़ुदा के लिए मेरे दिल के इस तोहफ़े को क़बूल कर लीजिए, और इसके टूटे हुए होने की तरफ़ मत देखिए।
10
यही नज़र है जो अब क़ातिल-ए-ज़माना हुई
यही नज़र है कि उठती न थी किसी की तरफ़
यह वही नज़र है जो अब सारे ज़माने की क़ातिल बन चुकी है, जबकि पहले यह किसी की तरफ़ उठती भी नहीं थी।
11
ग़रीब-ख़ाना में लिल्लाह दो-घड़ी बैठो
बहुत दिनों में तुम आए हो इस गली की तरफ़
खुदा के वास्ते मेरे इस गरीब-खाने में थोड़ी देर बैठ जाओ, क्योंकि बहुत दिनों के बाद तुम इस गली की तरफ आए हो।
12
ज़रा सी देर ही हो जाएगी तो क्या होगा
घड़ी घड़ी न उठाओ नज़र घड़ी की तरफ़
अगर थोड़ी सी देर हो भी जाएगी तो क्या हर्ज़ है? बार-बार घड़ी की तरफ़ नज़र मत उठाओ।
13
जो घर में पूछे कोई ख़ौफ़ क्या है कह देना
चले गए थे टहलते हुए किसी की तरफ़
अगर घर पर कोई पूछे तो डरने की क्या बात है, बस कह देना कि हम यूँ ही टहलते हुए किसी की ओर चले गए थे।
14
हज़ार जल्वा-ए-हुस्न-ए-बुताँ हो ऐ 'अकबर'
तुम अपना ध्यान लगाए रहो उसी की तरफ़
ऐ अकबर, चाहे सांसारिक सुंदरियों के सौंदर्य के हज़ारों जलवे मौजूद हों, तुम अपना ध्यान केवल उसी (ईश्वर) की ओर लगाए रखो।
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