अकबर इलाहाबादी
उनकी शायरी 'कुल्लियात-ए-अकबर' के कई भागों में संकलित है। 'आह जो दिल से निकाली जाएगी' और 'बिठाई जाएँगी पर्दे में बीबियाँ कब तक' जैसी रचनाएँ उनके व्यंग्य और सामाजिक दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। उन्होंने पारंपरिक ग़ज़ल के साथ-साथ नज़्मों में भी अद्वितीय योगदान दिया।
उनकी शैली हास्य, व्यंग्य और बुद्धिमत्ता का बेजोड़ संगम थी। उन्होंने उर्दू शायरी में नए अंग्रेजी शब्दों और बोलचाल के मुहावरों का प्रयोग कर सांस्कृतिक परिवर्तन पर करारी चोट की।
ब्रिटिश सरकार ने उनकी न्यायिक सेवाओं के लिए उन्हें 1898 में 'ख़ान बहादुर' की उपाधि से नवाज़ा था। साहित्यिक जगत में उन्हें 'लिसान-उल-असर' (युग की आवाज़) के प्रतिष्ठित उपनाम से याद किया जाता है।
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