ग़ज़ल
हँसी में वो बात मैं ने कह दी कि रह गए आप दंग हो कर
ہنسی میں وہ بات میں نے کہہ دی کہ رہ گئے آپ دنگ ہو کر
यह ग़ज़ल प्रेम, मन के गहरे रहस्यों के अनायास प्रकटीकरण और आत्मिक यात्रा की निरंतरता को दर्शाती है। कवि ने बड़ी सहजता व विनोद में दिल का छिपा राज़ ज़ाहिर कर महबूब को हैरान कर दिया है, साथ ही अपनी ज़िंदगी की रवानगी और ठहराव को एक अर्थपूर्ण सफ़र के रूप में प्रस्तुत किया है।
Source: rekhta · HI
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1
हँसी में वो बात मैं ने कह दी कि रह गए आप दंग हो कर
छुपा हुआ था जो राज़ दिल में खुला वो चेहरे का रंग हो कर
मैंने हँसी-मज़ाक में वह बात कह दी जिसे सुनकर आप हैरान रह गए, और जो राज़ दिल में छिपा हुआ था वह आपके चेहरे के बदलते रंग से ज़ाहिर हो गया।
2
हमेशा कूच ओ मक़ाम अपना रहा है ख़िज़्र-ए-रह-ए-तरीक़त
रुका तो मैं संग-ए-मील बन कर चला तो आवाज़-ए-चंग हो कर
अध्यात्म की राह पर मेरा चलना और रुकना हमेशा दूसरों का मार्गदर्शन करता रहा है; जब मैं ठहरा तो मील का पत्थर बना और जब चला तो चंग (वाद्य यंत्र) की आवाज़ बन कर राह दिखाई।
3
न तोड़ते आरसी अगर तुम तो इतने यूसुफ़ नज़र न आते
ये क़ाफ़िला खींच लाई सारा शिकस्त-ए-आईना ज़ंग हो कर
अगर तुम आईना न तोड़ते तो इतने यूसुफ़ नज़र न आते; आईने का टूटना कारवाँ की घंटी बनकर इस पूरे क़ाफ़िले को यहाँ खींच लाया है।
4
शबाब ओ पीरी का आना जाना ग़ज़ब का पुर-दर्द है फ़साना
ये रह गई बन के गर्द-ए-हसरत वो उड़ गया रुख़ से रंग हो कर
जवानी का जाना और बुढ़ापे का आना एक बेहद दर्दनाक दास्तान है; बुढ़ापा हसरतों की धूल बनकर रह गया और जवानी चेहरे से रंग की तरह उड़ गई।
5
जो राज़ दिल से ज़बाँ तक आया तो उस को क़ाबू में फिर न पाया
ज़बाँ से निकला कलाम बन कर कमाँ से छूटा ख़दंग हो कर
जब कोई राज़ दिल से ज़ुबान पर आ जाता है, तो फिर उसे क़ाबू में नहीं रखा जा सकता; वह बात बनकर मुँह से उसी तरह निकल जाता है जैसे कमान से छूटा हुआ तीर।
6
ग़ज़ब है बहर-ए-फ़ना का धारा कि मुझ को उलझा के मारा मारा
नफ़स ने मौजों का जाल बुन कर लहद ने काम-ए-नहंग हो कर
विनाश के समुद्र की धारा कितनी भयानक है जिसने मुझे उलझाकर मार डाला; साँसों ने लहरों का जाल बुन दिया और क़ब्र मगरमच्छ के जबड़े की तरह बन गई।
7
मिला दिल-ए-ना-हिफ़ाज़ मुझ को तो क्या किसी का लिहाज़ मुझ को
कहीं गरेबाँ न फाड़ डालें जनाब-ए-नासेह भी तंग हो कर
जब मुझे एक बेपरवाह और बेलगाम दिल मिला है, तो मुझे किसी का क्या लिहाज़ हो। डर है कि मुझे समझाते-समझाते कहीं उपदेशक (नासेह) भी तंग आकर अपना ही गिरेबान न फाड़ लें।
8
जो अब की मीना-ए-मय को तोड़ा चलेगी तलवार मोहतसिब से
लहू भी रिंदों का देख लेना बहा मय-ए-लाला-रंग हो कर
अगर इस बार मोहतसिब (धर्म-निरीक्षक) ने शराब की सुराही तोड़ी तो उससे तलवार चल जाएगी, और देखना कि मतवालों का ख़ून भी लाल शराब की तरह बह निकलेगा।
9
न ज़ब्त से शिकवा लब तक आया न सब्र ने आह खींचने दी
रहा दहन में वो क़ुफ़्ल बन कर गिराया छाती पे संग हो कर
न तो संयम के कारण कोई शिकायत होंठों तक आई और न ही सब्र ने आह भरने दी। वह दर्द मुँह में ताला बनकर रहा और छाती पर भारी पत्थर बनकर गिरा रहा।
10
समझ ले सूफ़ी अगर ये नुक्ता है एक बज़्म-ए-समा-ए-हस्ती
तो नौ-पियाले ये आसमाँ के बजें अभी जल-तरंग हो कर
यदि सूफ़ी यह बारीक बात समझ ले कि यह अस्तित्व संगीत की एक महफ़िल है, तो आकाश के ये नौ प्याले अभी जल-तरंग की तरह बज उठेंगे।
11
भला हो अफ़्सुर्दा-ख़ातिरी का कि हसरतों को दबा के रक्खा
बचा लिया हरज़गी से उस ने लिहाज़-ए-नामूस-ओ-नंग हो कर
भला हो दिल की इस उदासी का जिसने मेरी ख्वाहिशों को दबाकर रखा; इसने इज़्ज़त और मान-मर्यादा की रक्षा करते हुए मुझे आवारगी और बदचलनी से बचा लिया।
12
जिगर-ख़राशी से पाई फ़ुर्सत न सीना-कावी से नाख़ुनों ने
गला गरेबाँ ने घूँट डाला जुनूँ की शोरिश से तंग हो कर
नाखूनों को जिगर खरोंचने और सीना चीरने से कोई फ़ुर्सत नहीं मिली। आख़िरकार दीवानगी के इस हंगामे से तंग आकर गिरेबान ने ख़ुद ही गला घोंट दिया।
13
बदल के दुनिया ने भेस सदहा इसे डराया उसे लुभाया
कभी ज़न-ए-पीर-ज़ाल बन कर कभी बुत-ए-शोख़-ओ-शंग हो कर
दुनिया ने सैकड़ों रूप बदलकर इंसान को कभी डराया और कभी लुभाया; कभी वह एक बूढ़ी औरत बनकर सामने आई तो कभी एक शोख़ और चंचल सुंदरी बनकर।
14
उठे थे तलवार खींच कर तुम तो फिर तअम्मुल न चाहिए था
कि रह गई मेरे दिल की हसरत शहीद-ए-तेग़-ए-दरंग हो कर
जब तुम तलवार खींच कर उठ ही खड़े हुए थे, तो तुम्हें हिचकिचाना नहीं चाहिए था। तुम्हारी इस देर के कारण तुम्हारे हाथों क़त्ल होने की मेरे दिल की हसरत केवल इंतज़ार की भेंट चढ़ कर अधूरी रह गई।
15
जो वलवले थे वो दब गए सब हुजूम-ए-लैत-ओ-लअल में 'हैदर'
जो हौसले थे वो दिल ही दिल में रहे दरेग़-ओ-दरंग हो कर
ऐ हैदर, सारे जोश और उमंग टालमटोल और हीला-हवाली की भीड़ में दब गए, और सारे हौसले अफ़सोस व हिचकिचाहट बनकर दिल ही दिल में दफ़्न होकर रह गए।
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