हमेशा कूच ओ मक़ाम अपना रहा है ख़िज़्र-ए-रह-ए-तरीक़त रुका तो मैं संग-ए-मील बन कर चला तो आवाज़-ए-चंग हो कर

“My halts and journeys ever served as a guide upon the Mystic Way: when I paused, I stood as a milestone; when I moved, the ringing music of a harp.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

अध्यात्म की राह पर मेरा चलना और रुकना हमेशा दूसरों का मार्गदर्शन करता रहा है; जब मैं ठहरा तो मील का पत्थर बना और जब चला तो चंग (वाद्य यंत्र) की आवाज़ बन कर राह दिखाई।

विस्तार

यहाँ शायर अपनी ज़िंदगी और रूहानी सफ़र की बात करते हुए कहते हैं कि उनका ठहरना और चलना, दोनों ही दूसरों के लिए रास्ता दिखाने का ज़रिया बने। जब वे रुके तो मील का पत्थर बन गए ताकि राहगीर अपनी दूरी और दिशा पहचान सकें, और जब वे आगे बढ़े तो चंग यानी साज़ की धुन बन गए जिसने पूरे कारवाँ में नया हौसला भर दिया। यह शेर सिखाता है कि एक सच्चे साधक की खामोशी भी रास्ता दिखाती है और उसकी हरकत भी ज़िंदगी का संगीत बन जाती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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