“How dire is the tide of oblivion's sea, entangling and dashing me down— / Each breath wove a net of rising waves, the grave became a sea-monster's jaws.”
विनाश के समुद्र की धारा कितनी भयानक है जिसने मुझे उलझाकर मार डाला; साँसों ने लहरों का जाल बुन दिया और क़ब्र मगरमच्छ के जबड़े की तरह बन गई।
शायर यहाँ ज़िंदगी और मौत के सफ़र को फ़ना यानी नश्वरता के एक तूफ़ानी समंदर की तरह पेश कर रहे हैं। सबसे गहरा दर्द इस बात का है कि जो साँसें हमें ज़िंदा रखती हैं, वही लहरों का जाल बनकर हमें उलझा रही हैं और कब्र किसी समुद्री दैत्य या मगरमच्छ के जबड़े की तरह मुँह खोले इंतज़ार कर रही है। यह शेर बड़ी बेबसी से दिखाता है कि इंसान की हर साँस उसे ज़िंदगी देने के बजाय चुपचाप मौत के शिकंजे में धकेलती जाती है।
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