बदल के दुनिया ने भेस सदहा इसे डराया उसे लुभाया कभी ज़न-ए-पीर-ज़ाल बन कर कभी बुत-ए-शोख़-ओ-शंग हो कर

“Assuming a hundred disguises, the world frightened one and tempted another; appearing sometimes as a decrepit crone, and at times as a playful, coquettish idol.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

दुनिया ने सैकड़ों रूप बदलकर इंसान को कभी डराया और कभी लुभाया; कभी वह एक बूढ़ी औरत बनकर सामने आई तो कभी एक शोख़ और चंचल सुंदरी बनकर।

विस्तार

शायर यहाँ दुनिया की मायावी और धोखेबाज़ फितरत को बहुत खूबसूरती से बयां कर रहे हैं। यह ज़माना इंसान को आज़माने के लिए न जाने कितने रूप बदलता है—कभी एक बुढ़िया बनकर दुखों और मौत का ख़ौफ़ दिखाता है, तो कभी किसी हसीन और शोख़ दिलरुबा की तरह सामने आकर हमें लुभाता है। यह शेर हमें समझाता है कि दुनिया की असलियत सिर्फ़ एक फरेब है, इसलिए इसके डर और लालच दोनों से बेअसर रहना ही अक्लमंदी है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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