उठे थे तलवार खींच कर तुम तो फिर तअम्मुल न चाहिए था कि रह गई मेरे दिल की हसरत शहीद-ए-तेग़-ए-दरंग हो कर

“Having drawn your sword and risen, you should not have hesitated so; for the longing in my heart was martyred merely by the blade of your delay.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

जब तुम तलवार खींच कर उठ ही खड़े हुए थे, तो तुम्हें हिचकिचाना नहीं चाहिए था। तुम्हारी इस देर के कारण तुम्हारे हाथों क़त्ल होने की मेरे दिल की हसरत केवल इंतज़ार की भेंट चढ़ कर अधूरी रह गई।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ अपने महबूब से एक ख़ूबसूरत और दर्द भरी शिकायत कर रहा है। ग़ज़ल की परंपरा में महबूब के हाथों क़त्ल होना आशिक़ के लिए सबसे बड़ा रुतबा माना जाता है, इसलिए वह बेसब्री से उस वार का इंतज़ार कर रहा था। मगर जब महबूब ने तलवार खींचकर भी वार करने में देर कर दी, तो आशिक़ तड़प उठा कि उसकी तमन्ना असली तलवार से नहीं, बल्कि महबूब की हिचकिचाहٹ और इंतज़ार के खंजर से ही क़त्ल हो गई।

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