न ज़ब्त से शिकवा लब तक आया न सब्र ने आह खींचने दी रहा दहन में वो क़ुफ़्ल बन कर गिराया छाती पे संग हो कर

“Neither did restraint let complaint reach my lips, nor patience allow a sigh to rise; it locked my mouth in silence, then crushed upon my chest like heavy stone.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

न तो संयम के कारण कोई शिकायत होंठों तक आई और न ही सब्र ने आह भरने दी। वह दर्द मुँह में ताला बनकर रहा और छाती पर भारी पत्थर बनकर गिरा रहा।

विस्तार

यहाँ शायर ख़ामोशी में सहे जाने वाले गहरे दर्द की तस्वीर खींचते हैं। जब इंसान पर ग़म टूटता है, तो उसका 'ज़ब्त' उसे शिकायत नहीं करने देता और 'सब्र' एक आह तक भरने की इजाज़त नहीं देता। नतीजा यह होता है कि वो अनकहा दर्द होंठों पर ताला बनकर जम जाता है और सीने पर भारी पत्थर की तरह गिरकर अंदर ही अंदर दम घोंटता रहता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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