ग़ज़ल

आ के मुझ तक कश्ती-ए-मय साक़िया उल्टी फिरी

آ کے مجھ تک کشتیٔ مے ساقیا الٹی پھری
नज़्म तबातबाई· Ghazal· 15 shers· radif: उल्टी फिरी

यह ग़ज़ल कवि के दुर्भाग्य, निराशा और लगातार मिलने वाली वंचना की व्यथा को व्यक्त करती है। इसमें दिखाया गया है कि सुख और सांत्वना की उम्मीद ऐन वक्त पर भी उल्टे पाँव लौट जाती है और हर परिस्थिति उसके विरुद्ध हो जाती है। यह पूरी रचना विडंबनापूर्ण नियति और गहरे रंज-ओ-अलम के भाव से ओत-प्रोत है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
आ के मुझ तक कश्ती-ए-मय साक़िया उल्टी फिरी आज क्या नद्दी बही उल्टी हवा उल्टी फिरी
हे साक़ी, शराब का प्याला मुझ तक पहुँचकर भी वापस लौट गया; क्या आज नदी उल्टी बहने लगी है या हवा का रुख़ उलट गया है?
2
आते आते लब पर आह-ए-ना-रसा उल्टी फिरी वो भी मेरा ही दबाने को गला उल्टी फिरी
मेरी बेअसर आह होंठों तक पहुँचते-पहुँचते वापस लौट आई, और वह भी सिर्फ़ मेरा ही गला घोंटने के लिए उल्टी मुड़ गई।
3
मुड़ के देखा उस ने और वार अबरुओं का चल गया इक छुरी सीधी फिरी और इक ज़रा उल्टी फिरी
उसने मुड़कर देखा और उसकी भौंहों का वार चल गया; ऐसा लगा मानो एक छुरी सीधी चली हो और दूसरी थोड़ी उल्टी।
4
ला सका नज़्ज़ारा-ए-रुख़्सार-ए-रौशन की न ताब जा के आईने पे चेहरे की ज़िया उल्टी फिरी
आईना उस रोशन गाल के दीदार की ताब न ला सका, और चेहरे का नूर आईने से टकराकर वापस लौट आया।
5
रास्त-बाज़ों ही को पीसा आसमाँ ने रात दिन वा-ए-क़िस्मत जब फिरी ये आसिया उल्टी फिरी
आसमान ने रात-दिन सिर्फ सच्चे और ईमानदार लोगों को ही पीसा है; अफ़सोस कि जब भी किस्मत की यह चक्की चली, उल्टी ही चली।
6
जो बड़ा बोल एक दिन बोले थे पेश आया वही गुम्बद-ए-गर्दूं से टकरा कर सदा उल्टी फिरी
एक दिन जो घमंड और शेखी भरी बातें कही गई थीं, आज वही सामने आ गई हैं; ठीक वैसे ही जैसे आसमान के गुंबद से टकराकर आवाज़ वापस लौट आती है।
7
रिज़्क़ खा कर ग़ैर की क़िस्मत का ज़ंबूर-ए-असल तू ने देखा हल्क़ तक जा कर ग़िज़ा उल्टी फिरी
ऐ शहद की मक्खी, किसी और के हिस्से का रिज़्क़ खाकर क्या तूने देखा कि वह खुराक गले तक पहुँचने के बाद भी वापस उलट गई?
8
तू सताइश-गर है उस का जो है तेरा मद्ह-ख़्वाँ ये तो ऐ मुशफ़िक़ ज़मीर-ए-मर्हबा उल्टी फिरी
तुम केवल उसी की प्रशंसा करते हो जो तुम्हारी प्रशंसा करता है; ऐ मेहरबान दोस्त, यह तो प्रशंसा और शाबाशी का उलटा ही नियम बन गया है।
9
जिस पर आई थी तबीअत की उसी ने कुछ न क़द्र जिंस-ए-दिल मानिंद-ए-जिंस-ए-नारवा उल्टी फिरी
जिस पर मेरा दिल आया था उसी ने मेरी कोई क़द्र नहीं की, और मेरा दिल किसी खोटे या न बिकने वाले सामान की तरह ख़ारिज होकर वापस लौट आया।
10
या तो कुशी डूबती थी या चली साहिल से दूर वाए नाकामी फिरी भी तो हवा उल्टी फिरी
या तो नाव डूब रही थी या किनारे से दूर जा रही थी। अफ़सोस कि बदकिस्मती ऐसी रही कि हवा का रुख बदला भी तो उल्टी दिशा में ही बदला।
11
गिरने वाला है किसी दुश्मन पे क्या तीर-ए-शहाब आसमाँ तक जा के क्यूँ आह-ए-रसा उल्टी फिरी
क्या किसी दुश्मन पर कोई टूटता तारा (तीर-ए-शहाब) गिरने वाला है, जो मेरी दूर तक पहुँचने वाली आह आसमान तक जाकर वापस लौट आई है?
12
जी गया मैं उस के आ जाने से दुश्मन मर गया देख कर ईसा को बालीं पर क़ज़ा उल्टी फिरी
उसके आ जाने से मैं फिर से जी उठा और दुश्मन मर गया; मेरे सिरहाने मसीहा को देखकर मौत भी उल्टे पाँव लौट गई।
13
मर गया बे-मौत मैं आख़िर अजल भी दूर है कूचा-ए-क़ातिल का बतला कर पता उल्टी फिरी
मैं आखिरकार असमय ही मर गया जबकि मेरी वास्तविक मौत अभी दूर थी; मौत भी मुझे क़ातिल (महबूब) की गली का पता बताकर वहीं से वापस लौट गई।
14
हिज्र की शब मुझ को उल्टी साँस लेते देख कर एक ही दम में वहाँ जा कर सबा उल्टी फिरी
जुदाई की रात मुझे अंतिम साँसें लेते देखकर, सुबह की हवा एक ही पल में महबूब के पास जाकर तुरंत वापस लौट आई।
15
है मिरा वीराना-ए-ग़म 'नज़्म' ऐसा हौल-नाक मौज-ए-सैल आई तो ले कर बोरिया उल्टी फिरी
ऐ नज़्म, मेरे ग़म का वीराना इतना ख़ौफ़नाक है कि जब सैलाब की लहर आई तो वह भी अपना बोरिया समेट कर उल्टे पाँव लौट गई।
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