“So terrifying, O Nazm, is this desolate wilderness of my grief, that even the surging flood packed its meager mat and turned back in fear.”
ऐ नज़्म, मेरे ग़म का वीराना इतना ख़ौफ़नाक है कि जब सैलाब की लहर आई तो वह भी अपना बोरिया समेट कर उल्टे पाँव लौट गई।
नज़्म तबतबाई यहाँ अपने ग़म की वीरानी को एक बहुत ही दिलचस्प और अनोखे अंदाज़ में बयां कर रहे हैं। आमतौर पर सैलाब हर बस्ती को तबाह कर देता है, लेकिन शायर के दिल का वीराना इतना ख़ौफ़नाक और वीरान है कि ख़ुद तूफ़ान भी वहाँ ठहरने से डर गया। वह तबाही मचाने के बजाय डर के मारे अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर उल्टे पाँव भाग निकला। यह दर्द की बेपनाह गहराई को दिखाने वाला एक बेहद खूबसूरत और चुटीला मुबालग़ा (अतिशयोक्ति) है।
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