ग़ज़ल
वैसा कहाँ है हम से जैसा कि आगे था तू
वैसा कहाँ है हम से जैसा कि आगे था तू
यह ग़ज़ल एक ऐसे रिश्ते की विडंबना पर बात करती है जो समय के साथ बदल गया है। शायर महसूस करता है कि प्रिय व्यक्ति पहले जैसा नहीं रहा और उसका आकर्षण भी कम हो गया है। वह अतीत की मधुर यादों और वर्तमान की दूरी के बीच के भावनात्मक संघर्ष को व्यक्त करता है।
गीत सुनें
1
वैसा कहाँ है हम से जैसा कि आगे था तू
औरों से मिल के प्यारे कुछ और हो गया तू
तुम हम से पहले जैसे थे, वैसे अब नहीं रहे। प्यारे, दूसरों से मिलकर तुम कुछ और हो गए हो।
2
चालें तमाम बे-ढब बातें फ़रेब हैं सब
हासिल कि ऐ शुक्र लब अब वो नहीं रहा तू
ये सारी बेढब बातें और बातें फ़रेब हैं सब, शुक्र है ऐ लब कि अब वो नहीं रहा तू।
3
जाते नहीं उठाए ये शोर हर सहर के
या अब चमन में बुलबुल हम ही रहेंगे या तू
यह शोर हर सुबह के उठने पर नहीं जाता, या अब इस बाग में बुलबुल हम रहेंगे या तुम।
4
आ अब्र एक दो दम आपस में रखें सोहबत
कुढ़ने को हूँ मैं आँधी रोने को है बला तू
ऐ अब्र, एक दो दम आपस में रखें सोहबत, कुढ़ने को हूँ मैं आँधी रोने को है बला तू। इसका शाब्दिक अर्थ है कि हे बादल, थोड़ी देर तक साथ रहो, क्योंकि मैं एक तूफ़ान हूँ जो रोने और बरसने को तैयार है।
5
तक़रीब पर भी तो तू पहलू तही करे है
दस बार 'ईद आई कब कब गले मिला तू
तक़रीब पर भी तो तू पहलू तही करे है, दस बार 'ईद आई कब कब गले मिला तू। शायर कह रहा है कि तुम अनुमान पर भी मेरे पास ही रहती हो, और यह भी कहता है कि ईद कई बार आई, पर तुम मुझसे गले नहीं मिली।
6
तेरे दहन से उस को निस्बत हो कुछ तो कहिए
गुल गो करे है दा'वा ख़ातिर में कुछ न ला तू
तेरे दहन से उस को निस्बत हो कुछ तो कहिए, गुल गो करे है दा'वा ख़ातिर में कुछ न ला तू। (अर्थ: उस को कह देना कि तुम्हारे जलने से उसका मुझ से कोई रिश्ता हो, और अगर तुम मेरे लिए कुछ नहीं लाते हो, तो यह दावा न करना।)
7
दिल क्यूँके रास्त आवे दावा-ए-आश्नाई
दरिया-ए-हुस्न वो मह-ए-कश्ती-ब-कफ़ गदा तू
हे दिल, यह रास्ता क्यों आ रहा है, जो महबूब का दावा है? हे तू, जो सुंदरता की नदी और कश्ती का चाँद है, मैं तेरा गुलाम हूँ।
8
हर फ़र्द यास अभी से दफ़्तर है तुझ गले का
है क़हर जब कि होगा हर्फ़ों से आश्ना तू
हर व्यक्ति अभी से तुम्हारे गले के दफ्तर में है; क्योंकि जब तुम अक्षरों से परिचित हो जाओगी, तो यह क्रोध होगा।
9
'आलम है शौक़-कुश्ता ख़िल्क़त है तेरी रफ़्ता
जानों की आरज़ू तू आँखों का मुद्द'आ तू
तुम्हारा संसार ही सृजन का शौक़-कुश्ता है, और तेरा धीमा चलना, ऐ तू! तू रूहों की आरज़ू है और आँखों का मुद्द'आ है।
10
मुँह करिए जिस तरफ़ को सो ही तिरी तरफ़ है
पर कुछ नहीं है पैदा कीधर है ऐ ख़ुदा तू
जिस भी दिशा में मुँह करो, वह दिशा तुम्हारी ही है, हे प्रिय, पर सच कहूँ तो कहीं भी कुछ भी पैदा नहीं हुआ है, ऐ खुदा तू।
11
आती ब-ख़ुद नहीं है बाद-ए-बहार अब तक
दो गाम था चमन में टक नाज़ से चला तू
वसंत की हवा अभी खुद-ब-खुद नहीं आ रही है, और तुम बगीचे में इतनी नज़ाकत से चले गए।
12
कम मेरी और आना कम आँख का मिलाना
करने से ये अदाएँ है मुद्द'आ कि जा तू
कम मेरी और आना कम आँख का मिलाना करने से ये अदाएँ हैं मुद्द'आ कि जा तू। (अर्थ: मेरा कम मौजूद होना, तुम्हारा कम आना, और आँखों का कम मिलना करने से ये अदाएँ हैं मुद्द'आ कि जा तू।)
13
गुफ़्त-ओ-शुनूद अक्सर मेरे तिरे रहे है
ज़ालिम मु'आफ़ रखियो मेरा कहा-सुना तू
गुफ़्त-ओ-शुनूद का मतलब है बातें और खामोशी। शायर कहता है कि उसने अक्सर ये दोनों चीज़ें महसूस की हैं, और ज़ालिम से गुज़ारिश करता है कि वह उसके कहे हुए शब्दों को सुरक्षित रखे।
14
कह साँझ के मूए को ऐ 'मीर' रोएँ कब तक
जैसे चराग़-ए-मुफ़्लिस इक-दम में जल बुझा तू
ऐ मीर, साँझ के मूए (साँझ के चुंबन) के लिए रोना कब तक? जैसे एक कंगाल के दीपक से पल भर में जल बुझ गया।
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