कह साँझ के मूए को ऐ 'मीर' रोएँ कब तक जैसे चराग़-ए-मुफ़्लिस इक-दम में जल बुझा तू

“O Mir, how long will you weep for the evening's kisses? Like a lamp of a pauper, you are extinguished in an instant.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

ऐ मीर, साँझ के मूए (साँझ के चुंबन) के लिए रोना कब तक? जैसे एक कंगाल के दीपक से पल भर में जल बुझ गया।

विस्तार

यह शेर जीवन की क्षणभंगुरता और खूबसूरती के अचानक चले जाने की बात करता है। शायर पूछते हैं कि साँझ के मूए को, यानी सुंदरता को, रोना कब तक है। और इस उदासी की तुलना एक गरीब के दिए से करते हैं, जो एक पल में बुझ जाता है। यह एहसास दिलाता है कि जीवन में सबसे बड़ी विदाई कितनी अचानक और दर्दनाक हो सकती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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