ग़ज़ल
लज़्ज़त से नहीं ख़ाली जानों का खपा जाना
लज़्ज़त से नहीं ख़ाली जानों का खपा जाना
यह ग़ज़ल बताती है कि किसी के जीवन का आनंद केवल भोग-विलास (लज़्ज़त) तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गहरे अनुभव और आध्यात्मिक ज्ञान का समावेश भी है। शायर विभिन्न उपमाओं और उदाहरणों के माध्यम से जीवन की जटिलताओं और रहस्यमय प्रेम की अवस्था का वर्णन करता है, जहाँ भौतिकता और आध्यात्मिकता एक-दूसरे में घुलमिल जाते हैं। यह कविता जीवन के हर पहलू की गहराई को छूती है, जिसमें नश्वरता और शाश्वतता दोनों का भाव है।
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1
लज़्ज़त से नहीं ख़ाली जानों का खपा जाना
कब ख़िज़्र ओ मसीहा ने मरने का मज़ा जाना
जानों का खपा जाना (जानने का मज़ा) यानी जीवन का आनंद लेना, और खिज़्र व मसीहा ने कभी मरने का मज़ा नहीं जाना।
2
हम जाह-ओ-हशम याँ का क्या कहिए कि क्या जाना
ख़ातिम को सुलैमाँ की अंगुश्तर-ए-पा जाना
हम जाह-ओ-हशम याँ का क्या कहिए कि क्या जाना, ख़ातिम को सुलैमाँ की अंगुश्तर-ए-पा जाना। शायर कह रहा है कि इस स्थान की महिमा का वर्णन करना असंभव है, क्योंकि यहाँ की पवित्रता इतनी अधिक है कि यहाँ तक कि ख़ातिम को भी सुलैमान के स्पर्श का अनुभव हुआ था।
3
ये भी है अदा कोई ख़ुर्शीद नमत प्यारे
मुँह सुब्ह दिखा जाना फिर शाम छुपा जाना
यह भी एक अदा है, प्यारे, जो सूरज का तोहफा है; सुबह का चेहरा दिखाना और शाम को छिप जाना।
4
कब बंदगी मेरी सी बंदा करेगा कोई
जाने है ख़ुदा उस को मैं तुझ को ख़ुदा जाना
कोई मेरी जैसी बंदगी कौन करेगा? मैं नहीं जानता, पर खुदा जानता है, मैंने तुझे ही खुदा माना।
5
था नाज़ बहुत हम को दानिस्त पर अपनी भी
आख़िर वो बुरा निकला हम जिस को भला जाना
हम अपनी दानिस्त पर बहुत नाज़ करते थे, पर आख़िर वो बुरा निकला जिसे हम भला समझते थे।
6
गर्दन-कशी क्या हासिल मानिंद बगूले की
इस दश्त में सर गाड़े जूँ सैल चला जाना
गर्दन-कशी से क्या लाभ है, जैसे बगुले की? इस रेगिस्तान में, बेहतर है कि अकेले ही निकल पड़ें और चले जाएं।
7
इस गिर्या-ए-ख़ूनीं का हो ज़ब्त तो बेहतर है
अच्छा नहीं चेहरे पर लोहू का बहा जाना
इस रक्त-stained भूमि को वश में करना बेहतर है, और चेहरे पर रक्त का बहना अच्छा नहीं है।
8
ये नक़्श दिलों पर से जाने का नहीं उस को
आशिक़ के हुक़ूक़ आ कर नाहक़ भी मिटा जाना
ये नक़्श दिल से नहीं मिटने वाले होते, उस के लिए। आशिक़ के हक़ भी, अगर बेकार हो जाएं, तो मिटा दिए जाएं।
9
ढब देखने का ईधर ऐसा ही तुम्हारा था
जाते तो हो पर हम से टुक आँख मिला जाना
ढब देखने का ईधर ऐसा ही तुम्हारा था, जैसे तुम जा रहे हो पर मेरी आँखों में एक नज़र मिलाते हुए।
10
उस शम्अ की मज्लिस में जाना हमें फिर वाँ से
इक ज़ख़्म-ए-ज़बाँ ताज़ा हर रोज़ उठा जाना
उस शर्म की महफ़िल में जाना हमें फिर से, और वहाँ से हर रोज़ ज़ुबान का एक नया घाव उठा लाना।
11
ऐ शोर-ए-क़यामत हम सोते ही न रह जावें
इस राह से निकले तो हम को भी जगा जाना
ऐ क़यामत के शोर में हम सोते न रह जाएँ, अगर हम इस रास्ते से निकलें तो हमें भी जगा देना।
12
क्या पानी के मोल आ कर मालिक ने गुहर बेचा
है सख़्त गिराँ सस्ता यूसुफ़ का बिका जाना
क्या मालिक ने पानी का मोल पूछकर, कीमती रत्न बेच दिया? क्या जो चीज़ सख़्त और गिराँ है, वह सस्ते में यूसुफ़ की कहानी की तरह बिक गई है।
13
है मेरी तिरी निस्बत रूह और जसद की सी
कब आप से मैं तुझ को ऐ जान जुदा जाना
मेरा आप से रिश्ता रूह और जिस्म जैसा है; ऐ जान, मैं कब आपसे अलग हो पाऊँगा।
14
जाती है गुज़र जी पर उस वक़्त क़यामत सी
याद आवे है जब तेरा यक-बारगी आ जाना
जब गुज़रना एक क़यामत जैसा लगता है, तब मुझे वह याद आती है जब तुम सिर्फ़ एक बार आए थे।
15
बरसों से मिरे उस की रहती है यही सोहबत
तेग़ उस को उठाना तो सर मुझ को झुका जाना
बरसों से मेरे उस की यही सोहबत है, कि उसका तेग उठाना तो सर को झुकाना है।
16
कब 'मीर' बसर आए तुम वैसे फ़रेबी से
दिल को तो लगा बैठे लेकिन न लगा जाना
शायर से कहते हैं कि वे किसी ऐसे धोखेबाज़ स्रोत से न आएं, क्योंकि दिल तो लग चुका है, लेकिन उसे खोने न दें।
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