उस शम्अ की मज्लिस में जाना हमें फिर वाँ से इक ज़ख़्म-ए-ज़बाँ ताज़ा हर रोज़ उठा जाना

“To go to that assembly of shame again from there, To bear a fresh wound of the tongue every day.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

उस शर्म की महफ़िल में जाना हमें फिर से, और वहाँ से हर रोज़ ज़ुबान का एक नया घाव उठा लाना।

विस्तार

यह शेर उस दर्द को बयां करता है जो बार-बार होने वाले मिलन में छिपा होता है। 'शम्अ की मज्लिस' महबूब की महफ़िल है, जो नशीली तो है, पर ज़हर भी है। शायर कहते हैं कि उस महफ़िल में वापस जाना मतलब एक पुराने ज़ख्म को फिर से कुरेदना है। यह दिखाता है कि इश्क़ की दुनिया में, हर मुलाक़ात एक नई तड़प और नए ज़ख्म लेकर आती है।

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