“What can we say of the glory of this place, what can we speak of it, when even Khatim knew Solomon's finger-touch”
हम जाह-ओ-हशम याँ का क्या कहिए कि क्या जाना, ख़ातिम को सुलैमाँ की अंगुश्तर-ए-पा जाना। शायर कह रहा है कि इस स्थान की महिमा का वर्णन करना असंभव है, क्योंकि यहाँ की पवित्रता इतनी अधिक है कि यहाँ तक कि ख़ातिम को भी सुलैमान के स्पर्श का अनुभव हुआ था।
यह शेर साधारण और अलौकिक अनुभवों के बीच का अंतर बताता है। शायर कहते हैं कि हम तो आम जगहों की बात कर रहे हैं, लेकिन जब बात किसी पवित्र और ऐतिहासिक घटना की आती है—जैसे सुलैमान और ख़ातिमा का मिलन—तो शब्दों का सहारा लेना भी कम पड़ जाता है। यह शेर बताता है कि कुछ यादें इतनी गहरी होती हैं कि उनका वर्णन करना लगभग नामुमकिन है।
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