ग़ज़ल
सदा है फ़िक्र-ए-तरक़्क़ी बुलंद-बीनों को
سدا ہے فکر ترقی بلند بینوں کو
यह ग़ज़ल उच्च दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्तियों की प्रगतिशील सोच और बुलंद हौसलों को रेखांकित करती है। इसमें सांसारिक सौंदर्य में ईश्वर की कारीगरी के दर्शन और वैचारिक उदात्तता का सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया गया है।
Source: rekhta · HI
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1
सदा है फ़िक्र-ए-तरक़्क़ी बुलंद-बीनों को
हम आसमान से लाए हैं इन ज़मीनों को
ऊंची सोच रखने वाले लोगों को हमेशा तरक्की और ऊंचाई की ही चिंता रहती है, जबकि हम इन ज़मीनों को सीधे आसमान से उतार कर लाए हैं।
2
पढ़ें दुरूद न क्यूँ देख कर हसीनों को
ख़याल-ए-सनअत-ए-साने है पाक-बीनों को
पवित्र दृष्टि रखने वाले हसीनों को देखकर भला दुरूद (दुआ) क्यों न पढ़ें, क्योंकि उन्हें तो उनमें ईश्वर (सृष्टिकर्ता) की कारीगरी का ध्यान आता है।
3
कमाल-ए-फ़क़्र भी शायाँ है पाक-बीनों को
ये ख़ाक तख़्त है हम बोरिया-नशीनों को
फ़क़ीरी और त्याग का चरम रूप केवल पवित्र दृष्टि रखने वालों को ही शोभा देता है, और हम जैसे साधारण चटाई पर बैठने वालों के लिए यह धूल ही शाही तख़्त है।
4
लहद में सोए हैं छोड़ा है शह-नशीनों को
क़ज़ा कहाँ से कहाँ ले गई मकीनों को
शाही महलों को छोड़कर लोग अब क़ब्र में सोए हुए हैं; मौत इन रहने वालों को कहाँ से कहाँ ले आई है।
5
ये झुर्रियाँ नहीं हाथों पे ज़ोफ़-ए-पीरी ने
चुना है जामा-ए-असली की आस्तीनों को
मेरे हाथों पर ये झुर्रियां नहीं हैं, बल्कि बुढ़ापे की कमज़ोरी ने मेरे असल लिबास की आस्तीनों में सिलवटें डाल दी हैं।
6
लगा रहा हूँ मज़ामीन-ए-नौ के फिर अम्बार
ख़बर करो मिरे ख़िर्मन के ख़ोशा-चीनों को
मैं फिर से नए विषयों और विचारों का ढेर लगा रहा हूँ; मेरे खलिहान से दाने बटोरने वालों को इसकी सूचना दे दो।
7
भला तरद्दुद-ए-बेजा से उन में क्या हासिल
उठा चुके हैं ज़मींदार जिन ज़मीनों को
जिन ज़मीनों से ज़मींदार पहले ही सारी उपज ले चुके हैं, उन पर व्यर्थ की चिंता या मेहनत करने से क्या फ़ायदा है?
8
उन्हीं को आज नहीं बैठने की जा मिलती
मुआ'फ़ करते थे जो लोग कल ज़मीनों को
आज उन्हीं लोगों को बैठने तक की जगह नहीं मिल रही है, जो कल दूसरों को बड़ी-बड़ी ज़मीनें बख़्श (माफ़) दिया करते थे।
9
ये ज़ाएरों को मिलीं सरफ़राज़ियाँ वर्ना
कहाँ नसीब कि चूमें मलक जबीनों को
यह उच्च सम्मान और गौरव केवल तीर्थयात्रियों (ज़ायरीन) को प्राप्त हुआ है, अन्यथा फ़रिश्तों का ऐसा भाग्य कहाँ था कि वे इंसानी माथों को चूमते।
10
सजाया हम ने मज़ामीं के ताज़ा फूलों से
बसा दिया है इन उजड़ी हुई ज़मीनों को
हमने नए विचारों और विषयों के ताज़ा फूलों से सजाकर इन उजड़ी हुई ज़मीनों (या काव्य-ज़मीनों) को दोबारा आबाद कर दिया है।
11
लहद भी देखिए इन में नसीब हो कि न हो
कि ख़ाक छान के पाया है जिन ज़मीनों को
देखना यह है कि बहुत भटककर और ख़ाक छानकर जिन जमीनों को हासिल किया है, उनमें आख़िरकार मुझे एक क़ब्र भी नसीब होती है या नहीं।
12
ज़वाल-ए-ताक़त ओ मू-ए-सपीद ओ ज़ोफ़-ए-बसर
इन्हीं से पाए बशर मौत के क़रीनों को
शारीरिक ताक़त का घटना, बालों का सफ़ेद होना और आँखों की कमज़ोर नज़र—इन्हीं निशानियों से इंसान मौत के आने के आसार पहचानता है।
13
नहीं ख़बर उन्हें मिट्टी में अपने मिलने की
ज़मीं में गाड़ के बैठे हैं जो दफ़ीनों को
जो लोग ज़मीन में खज़ाने गाड़कर बैठे हैं, उन्हें इस बात की तनिक भी ख़बर नहीं है कि एक दिन वे खुद भी मिट्टी में मिल जाएँगे।
14
ख़बर नहीं उन्हें क्या बंदोबस्त-ए-पुख़्ता की
जो ग़स्ब करने लगे ग़ैर की ज़मीनों को
क्या उन लोगों को उस पक्के इंतज़ाम या हिसाब की कोई ख़बर नहीं है, जो दूसरों की ज़मीनों पर नाजायज़ कब्ज़ा करने लगे हैं?
15
जहाँ से उठ गए जो लोग फिर नहीं मिलते
कहाँ से ढूँड के अब लाएँ हम-नशीनों को
जो लोग इस दुनिया से चले जाते हैं वे फिर कभी वापस नहीं मिलते, अब हम अपने बिछड़े हुए साथियों को कहाँ से ढूँढ़कर लाएँ?
16
नज़र में फिरती है वो तीरगी ओ तन्हाई
लहद की ख़ाक है सुर्मा मआल-बीनों को
आँखों के सामने हर वक़्त वह अंधेरा और अकेलापन घूमता रहता है; अंजाम पर नज़र रखने वालों के लिए क़ब्र की धूल ही आँखों का सुरमा है।
17
ख़याल-ए-ख़ातिर-ए-अहबाब चाहिए हर दम
'अनीस' ठेस न लग जाए आबगीनों को
हर समय दोस्तों की भावनाओं और दिल का ख़्याल रखना चाहिए; ऐ अनीस, ध्यान रखो कि शीशे जैसे इन नाज़ुक दिलों को कोई ठेस न लग जाए।
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