ये झुर्रियाँ नहीं हाथों पे ज़ोफ़-ए-पीरी ने चुना है जामा-ए-असली की आस्तीनों को

“These are not wrinkles on my hands; the frailty of old age has merely gathered the sleeves of my original robe into pleats.”

— मीर अनीस
अर्थ

मेरे हाथों पर ये झुर्रियां नहीं हैं, बल्कि बुढ़ापे की कमज़ोरी ने मेरे असल लिबास की आस्तीनों में सिलवटें डाल दी हैं।

विस्तार

इस शेर में शायर ने बुढ़ापे और झुर्रियों को देखने का बेहद खूबसूरत और अनोखा नज़रिया पेश किया है। वे हाथों की झुर्रियों को केवल लाचारी या ज़वाल नहीं मानते, बल्कि कहते हैं कि यह जिस्म तो कुदरत का दिया वो 'मूल लिबास' है जिसकी आस्तीनों को उम्र ने नफ़ासत से चुनटें देकर समेट लिया है। यह शेर ढलती उम्र की उदासी को एक गहरे सुकून और गरिमा में बदल देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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