“Let us see if even a grave will be my lot in these grounds, which I have gained only after sifting through the dust.”
देखना यह है कि बहुत भटककर और ख़ाक छानकर जिन जमीनों को हासिल किया है, उनमें आख़िरकार मुझे एक क़ब्र भी नसीब होती है या नहीं।
यह शेर ज़िंदगी की गहरी विडंबना और बेगानगी के दर्द को बड़ी ख़ूबसूरती से बयां करता है। शायर ने जिस मंज़िल, वतन या महबूब की ज़मीनों को पाने के लिए उम्र भर ख़ाक छानी और अनगिनत मुश्किलें सहीं, आज उसे यह भी यक़ीन नहीं कि आख़िरकार वहाँ उसे दो गज़ ज़मीन यानी क़ब्र भी नसीब होगी या नहीं। यह उस बेबसी का इज़हार है जहाँ इंसान अपना सब कुछ न्योछावर करके भी आख़िर में पराया ही रह जाता है।
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