कमाल-ए-फ़क़्र भी शायाँ है पाक-बीनों को ये ख़ाक तख़्त है हम बोरिया-नशीनों को

“The zenith of renunciation befits the pure of sight; for us who sit on humble mats, this very dust is a throne.”

— मीर अनीस
अर्थ

फ़क़ीरी और त्याग का चरम रूप केवल पवित्र दृष्टि रखने वालों को ही शोभा देता है, और हम जैसे साधारण चटाई पर बैठने वालों के लिए यह धूल ही शाही तख़्त है।

विस्तार

यह शेर सादगी और आध्यात्मिक बेपरवाही (फ़क़्र) की अनूठी शान को बयां करता है। शायर कहते हैं कि जिनकी नज़र साफ़ और पाकीज़ा होती है, उनके लिए दुनिया की दौलत कोई मायने नहीं रखती; संतोष ही उनका असली तख़्त बन जाता है। जो दरवेश ज़मीन पर बोरी बिछाकर बैठते हैं, उनके लिए यह ख़ाक ही किसी शाही सिंहासन से कम नहीं है।

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