ग़ज़ल
या रब ये जहान-ए-गुज़राँ ख़ूब है लेकिन
या रब ये जहान-ए-गुज़राँ ख़ूब है लेकिन
यह संसार भले ही बहुत खूबसूरत है, लेकिन इसमें कई तरह की विडंबनाएं और विरोधाभास भरे हैं। कवि कहता है कि लोग कभी सच्चाई और कला के सच्चे पुरुषों को नहीं समझते, और दुनिया केवल बाहरी दिखावे को ही महत्त्व देती है। यह समाज की दोहरी मानसिकता और सतही नज़रों पर एक व्यंग्य है।
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1
या रब ये जहान-ए-गुज़राँ ख़ूब है लेकिन
क्यूँ ख़्वार हैं मर्दान-ए-सफ़ा-केश ओ हुनर-मंद
हे रब, यह गुज़रने वाला संसार बहुत सुंदर है, लेकिन साफ हृदय वाले, कुशल और प्रतिभाशाली पुरुष इतने दुखी क्यों हैं?
2
गो इस की ख़ुदाई में महाजन का भी है हाथ
दुनिया तो समझती है फ़रंगी को ख़ुदावंद
इसकी ख़ुदाई में महाजन का भी हाथ है, दुनिया तो समझती है फ़रंगी को ख़ुदावंद।
3
तू बर्ग-ए-गयाहे न दही अहल-ए-ख़िरद रा
ओ किश्त-ए-गुल-ओ-लाला ब-बख़शद ब-ख़रे चंद
हे, तू क्षणभंगुर पत्ता नहीं और न ही बुद्धिमान लोगों का समूह; ओ, गुलाब और चमेली का ऋण, तुम्हें कुछ खरीददारी दे।
4
हाज़िर हैं कलीसा में कबाब ओ मय-ए-गुलगूँ
मस्जिद में धरा क्या है ब-जुज़ मौइज़ा ओ पंद
कलीसे में कबाब और बाग का मय है; मस्जिद में केवल उपदेश और किताब के सिवा क्या है।
5
अहकाम तिरे हक़ हैं मगर अपने मुफ़स्सिर
तावील से क़ुरआँ को बना सकते हैं पाज़ंद
तेरे नियम तुम्हारे हैं, पर अपने व्याख्याकार (मुफ़स्सिर) से कुरान को भी भ्रम (पाज़ंद) बनाया जा सकता है।
6
फ़िरदौस जो तेरा है किसी ने नहीं देखा
अफ़रंग का हर क़र्या है फ़िरदौस की मानिंद
फ़िरदौस जो तेरा है किसी ने नहीं देखा, अफ़रंग का हर क़र्या है फ़िरदौस की मानिंद।
7
मुद्दत से है आवारा-ए-अफ़्लाक मिरा फ़िक्र
कर दे इसे अब चाँद के ग़ारों में नज़र-बंद
बहुत समय से मेरा विचार आकाश का भटकने वाला था, इसे अब चाँद की गुफाओं में कैद कर दो।
8
फ़ितरत ने मुझे बख़्शे हैं जौहर मलाकूती
ख़ाकी हूँ मगर ख़ाक से रखता नहीं पैवंद
प्रकृति ने मुझे एक दैवीय सार प्रदान किया है, हालाँकि मैं धूल हूँ, फिर भी मैं अपना गर्व नहीं छोड़ता।
9
दरवेश-ए-ख़ुदा-मस्त न शर्क़ी है न ग़र्बी
घर मेरा न दिल्ली न सफ़ाहाँ न समरक़ंद
खुदा के दरवेश मस्त न पूरब है न पश्चिम; मेरा घर न दिल्ली है न सफ़ाहाँ न समरक़ंद।
10
कहता हूँ वही बात समझता हूँ जिसे हक़
ने आबला-ए-मस्जिद हूँ न तहज़ीब का फ़रज़ंद
मैं वही बात कहता हूँ, वही बात समझता हूँ जो हक़ ने (किस्मत ने) तय की है; मैं न तो मस्जिद का महबूब हूँ और न ही तहज़ीब का वंशज।
11
अपने भी ख़फ़ा मुझ से हैं बेगाने भी ना-ख़ुश
मैं ज़हर-ए-हलाहल को कभी कह न सका क़ंद
मेरे अपने भी मुझसे नाराज़ हैं, और पराये भी नाखुश हैं; मैं दोस्त, संसार के विष को कभी कह नहीं सका।
12
मुश्किल है हर इक बंदा-ए-हक़-बीन-ओ-हक़-अंदेश
ख़ाशाक के तोदे को कहे कोह-ए-दमावंद
हर व्यक्ति के लिए सच देखने वाला और सच का विचार करने वाला होना कठिन है, जो कह सके कि खशाक के छोटे समूह को दमावंद पर्वत जैसा कह सकता है।
13
हूँ आतिश-ए-नमरूद के शो'लों में भी ख़ामोश
मैं बंदा-ए-मोमिन हूँ नहीं दाना-ए-असपंद
मैं नमरूद के अलाव के शो'लों में भी शांत हूँ। मैं एक मोमिन (आस्तिक) व्यक्ति हूँ, न कि कलह का बीज।
14
पुर-सोज़ नज़र-बाज़ ओ निको-बीन ओ कम आज़ार
आज़ाद ओ गिरफ़्तार ओ तही कीसा ओ ख़ुरसंद
ऐ, पुर-सोज़ नज़र-बाज़ और निको-बीन और कम आज़ार; ऐ, आज़ाद और गिरफ़्तार, और तही कैसा और ख़ुरसंद।
15
हर हाल में मिरा दिल-ए-बे-क़ैद है ख़ुर्रम
क्या छीनेगा ग़ुंचे से कोई ज़ौक़-ए-शकर-ख़ंद
हर हाल में मेरा दिल आज़ाद है, ख़ुर्रम; किसी से गुँधे में मिठास का आनंद कैसे छीना जा सकता है।
16
चुप रह न सका हज़रत-ए-यज़्दाँ में भी 'इक़बाल'
करता कोई इस बंदा-ए-गुस्ताख़ का मुँह बंद
मैं चुप नहीं रह सका, यहाँ तक कि हज़रत-ए-यज़्दाँ की उपस्थिति में भी, 'इक़बाल' पूछता है, कौन इस गुस्ताख़ व्यक्ति का मुँह बंद करेगा।
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