“The dictates of the Beloved are indeed yours, but your own exegesis Can make the Quran itself a mere illusion.”
तेरे नियम तुम्हारे हैं, पर अपने व्याख्याकार (मुफ़स्सिर) से कुरान को भी भ्रम (पाज़ंद) बनाया जा सकता है।
यह शेर सिर्फ़ किसी धार्मिक नियम की बात नहीं करता.... यह तो ज्ञान और समझ की सीमा पर एक गहरा सवाल है! शायर साहब कहते हैं कि ये नियम तो अपने आप में सही हैं, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन जो व्यक्ति इन नियमों को 'तवील' यानी अपने तरीके से समझाएगा.... वह इस पवित्र ज्ञान को भी गुमराह कर सकता है। यह शेर हमें सिखाता है कि ज्ञान का दुरुपयोग कितना खतरनाक हो सकता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
