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अपने भी ख़फ़ा मुझ से हैं बेगाने भी ना-ख़ुश
मैं ज़हर-ए-हलाहल को कभी कह न सका क़ंद

My own are upset with me, and strangers are displeased; I could never utter the poison of the world, my friend.

अल्लामा इक़बाल
अर्थ

मेरे अपने भी मुझसे नाराज़ हैं, और पराये भी नाखुश हैं; मैं दोस्त, संसार के विष को कभी कह नहीं सका।

विस्तार

यह शेर गहरे अकेलेपन और सच्चाई के बोझ को बयां करता है। शायर कहते हैं कि मेरे अपने मुझ से ख़फ़ा हैं, और पराये भी नाख़ुश हैं। इसका मतलब है कि मेरा दर्द इतना गहरा है कि मैं इसे किसी के सामने खोल नहीं सकता। 'ज़हर-ए-हलाहल' और 'क़ंद' का ये रिश्ता बताता है कि मेरा सच इतना जटिल था कि इसे किसी को समझाना नामुमकिन था।

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