ग़ज़ल
तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं
تماشائے دیر و حرم دیکھتے ہیں
यह ग़ज़ल प्रेम और विरह की गहरी भावना को व्यक्त करती है, जहाँ आशिक़ मंदिर और मस्जिद के बंधनों से परे हर बहाने से महबूब का दीदार चाहता है। इसमें प्रियतम की बढ़ती बेरुखी और बदलती नज़रों से उपजे दर्द व उदासी का मार्मिक चित्रण है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं
तुझे हर बहाने से हम देखते हैं
हम मंदिर और काबा (मस्जिद) का तमाशा देखते हैं, मगर हर बहाने से वास्तव में हम केवल तुझे ही देखते हैं।
2
हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं
वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं
अब वे हमारी तरफ़ बहुत कम देखते हैं, और उनकी नज़रें भी अब वैसी नहीं रहीं जैसी कभी हम देखा करते थे।
3
ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं
हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं
हम ज़माने के न जाने कितने ज़ुल्म और सितम देखते हैं, और जो कुछ हम देख और सह रहे हैं उसे सिर्फ़ हम ही समझ सकते हैं।
4
फिरे बुत-कदे से तो ऐ अहल-ए-काबा
फिर आ कर तुम्हारे क़दम देखते हैं
ऐ काबा के लोगों, अगर हम कभी बुतकदे से वापस लौटे, तो फिर आकर तुम्हारे क़दम देखेंगे।
5
हमें चश्म-ए-बीना दिखाती है सब कुछ
वो अंधे हैं जो जाम-ए-जम देखते हैं
हमारी देखने और समझने वाली आँख ही हमें सब कुछ दिखा देती है, जबकि वे लोग अंधे हैं जो दुनिया देखने के लिए जाम-ए-जम का सहारा लेते हैं।
6
न ईमा-ए-ख़्वाहिश न इज़हार-ए-मतलब
मिरे मुँह को अहल-ए-करम देखते हैं
मैंने न तो अपनी किसी इच्छा का कोई इशारा किया और न ही अपनी ज़रूरत ज़ाहिर की, फिर भी उदार लोग मेरा चेहरा देख रहे हैं।
7
कभी तोड़ते हैं वो ख़ंजर को अपने
कभी नब्ज़-ए-बिस्मिल में दम देखते हैं
कभी वे अपने ख़ंजर को तोड़ देते हैं, तो कभी घायल शिकार की नब्ज़ टटोलकर देखते हैं कि उसमें अभी जान बाकी है या नहीं।
8
ग़नीमत है चश्म-ए-तग़ाफ़ुल भी उन की
बहुत देखते हैं जो कम देखते हैं
उनकी बेरुख़ी या उपेक्षा भरी नज़र भी ग़नीमत (नेमत) है, क्योंकि जो लोग कम देखते हैं वे असल में बहुत कुछ देख लेते हैं।
9
ग़रज़ क्या कि समझें मिरे ख़त का मज़मूँ
वो उनवान ओ तर्ज़-ए-रक़म देखते हैं
उन्हें मेरे ख़त के मज़मून (विषय) को समझने की क्या परवाह, वे तो बस उसका शीर्षक और लिखावट का अंदाज़ देखते हैं।
10
सलामत रहे दिल बुरा है कि अच्छा
हज़ारों में ये एक दम देखते हैं
दिल चाहे अच्छा हो या बुरा, वह सलामत रहे; क्योंकि हज़ारों के बीच हम इसी एक सांस या ज़िंदगी को देखते हैं।
11
रहा कौन महफ़िल में अब आने वाला
वो चारों तरफ़ दम-ब-दम देखते हैं
अब महफ़िल में आने के लिए कौन बाकी रह गया है? फिर भी वे लगातार चारों तरफ़ देखे जा रहे हैं।
12
उधर शर्म हाइल इधर ख़ौफ़ माने
न वो देखते हैं न हम देखते हैं
उस तरफ़ शर्म रुकावट बनी हुई है और इस तरफ़ डर रोक रहा है, इसलिए न वो देखते हैं और न हम देखते हैं।
13
उन्हें क्यूँ न हो दिलरुबाई से नफ़रत
कि हर दिल में वो ग़म अलम देखते हैं
उन्हें दिल जीतने या आकर्षित करने से नफ़रत क्यों न हो, जब वे हर दिल में केवल दुःख और दर्द ही देखते हैं।
14
निगहबाँ से भी क्या हुई बद-गुमानी
अब उस को तिरे साथ कम देखते हैं
पहरेदार या रखवाले से भी ऐसा क्या शक या अविश्वास हो गया है कि अब हम उसे तुम्हारे साथ बहुत कम देखते हैं?
15
हमें 'दाग़' क्या कम है ये सरफ़राज़ी
कि शाह-ए-दकन के क़दम देखते हैं
ऐ दाग़, हमारे लिए यह सम्मान क्या कम है कि हमें दकन के बादशाह के क़दम देखने (उनकी सेवा में उपस्थित होने) का सौभाग्य मिला है।
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