उन्हें क्यूँ न हो दिलरुबाई से नफ़रत — दाग़ देहलवी

उन्हें क्यूँ न हो दिलरुबाई से नफ़रत कि हर दिल में वो ग़म अलम देखते हैं

“Why shouldn't they despise the art of winning hearts, when in every heart it is only grief and sorrow they see?”

— दाग़ देहलवी

अर्थ

उन्हें दिल जीतने या आकर्षित करने से नफ़रत क्यों न हो, जब वे हर दिल में केवल दुःख और दर्द ही देखते हैं।

विस्तार

आम तौर पर ग़ज़लों में महबूब पर दिल चुराने और फिर बेपरवाह हो जाने का इल्ज़ाम लगाया जाता है, लेकिन यहाँ शायर ने बड़ी हमदर्दी से माशूक़ का पक्ष लिया है। वह कहता है कि अगर महबूब को दिल जीतने (दिलरुबाई) के इस हुनर से नफ़रत हो गई है, तो इसमें ताज्जुब कैसा? वह जिस भी दिल को जीतता है, उसमें मोहब्बत की रौशनी के बजाय सिर्फ़ पुराने दर्द, ग़म और अश्क ही भरे मिलते हैं। किसी के दिल का मालिक बनना अब कोई ख़ूबसूरत तोहफ़ा नहीं, बल्कि उसके दुखों का भारी बोझ बन गया है।

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