फिरे बुत-कदे से तो ऐ अहल-ए-काबा — दाग़ देहलवी
“Should we ever return from the house of idols, O folk of the Kaaba, we shall come then to pay homage at your feet.”
अर्थ
ऐ काबा के लोगों, अगर हम कभी बुतकदे से वापस लौटे, तो फिर आकर तुम्हारे क़दम देखेंगे।
विस्तार
इस शेर में इश्क़ के रंग में रंगे आशिक़ और ज़ाहिरी तौर पर धर्म निभाने वालों के बीच एक बहुत ख़ूबसूरत और चुटीली बातचीत है। शायर काबा वालों से मुस्कुराते हुए कहता है कि अगर हम कभी हुस्न और मोहब्बत के इस बुतकदे से रिहा हो सके, तब कहीं जाकर तुम्हारी चौखट पर हाज़िरी देंगे। इसमें एक मीठा सा तंज़ छिपा है कि जो दिल एक बार मोहब्बत की मस्ती में खो जाए, उसका रिवाजों और औपचारिक इबादत की तरफ़ लौटना नामुमकिन ही होता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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